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Tradition at Mankeshwari Temple: मानकेश्वरी मंदिर में 500 साल पुरानी परंपरा, बकरों की बलि, बैगा ने पिया खून

मन्नत पूरी होने पर बकरा चढ़ाते हैं श्रद्धालु, हजारों लोग पहुंचे

करमागढ़ में ५०० सालों से चली आ रही बल पूजा की परंपरा

मानकेश्वरी मंदिर में शरद पूर्णिमा पर सैकड़ों बकरों की बलि, उमड़े 15 हजार श्रद्धालु

रियासतकालीन परंपरा आज भी कायम, रायगढ़ और ओडिशा से पहुंचे भक्तों ने मांगी मन्नत

रायगढ़/नवप्रदेश। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के करमागढ़ स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर (Tradition at Mankeshwari Temple) में शरद पूर्णिमा पर 500 साल पुरानी बल पूजा की परंपरा निभाई गई। रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी के इस मंदिर में मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु बकरे लेकर पहुंचे। यहां 100 से ज्यादा बकरों की बलि दी गई।


पूजा (Tradition at Mankeshwari Temple) के दौरान बैगा के बकरों का खून पीने का वीडियो भी सामने आया है। समिति के सदस्यों और यहां मौजूद श्रद्धालुओं के मुताबिक, इस दिन बैगा के शरीर में देवी आतीं हैं और वो बलि दिए गए बकरों का खून पीती हैं। बल पूजा से एक रात पहले निशा पूजा की जाती है। इस दौरान राजपरिवार की ओर से बैगा के अंगूठे में नवरत्न की अंगूठी पहनाई जाती है, जो पूजा के दिन कस जाती है।

इस आयोजन (Tradition at Mankeshwari Temple) में रायगढ़ के अलावा ओडिशा और दूर-दराज के गांवों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु बकरा चढ़ाते हैं। राजपरिवार के सदस्य देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। ग्रामीण तेजराम सिदार के मुताबिक, मंदिर की स्थापना रायगढ़ राजपरिवार ने कराई थी। यहां निशा पूजन के दौरान बैगा को राजपरिवार की ओर से अंगूठी पहनाने की परंपरा भी प्रचलित है। ग्रामीण इसे देवी की उपस्थिति से जुड़ी मान्यता बताते हैं।

बैगा के शरीर में मां मानकेश्वरी का प्रभाव


रायगढ़ जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर ओडिशा सीमा से लगे जंगलों के बीच स्थित कर्मागढ़ में शरद पूर्णिमा पर सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया। मान्यता है कि पूजा के दौरान बैगा के शरीर में मां मानकेश्वरी का प्रभाव होता है और देवी को बलि अर्पित की जाती है। मंदिर को रायगढ़ राजपरिवार की कुलदेवी का स्थान माना जाता है।

मानकेश्वरी मंदिर (Tradition at Mankeshwari Temple) समिति के पूर्व अध्यक्ष युधिष्ठिर यादव ने बताया कि यह परंपरा करीब 500 साल से चली आ रही है। पूजा में शामिल होने के लिए दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। संतान प्राप्ति और बीमारी से मुक्ति जैसी मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धालु यहां बकरा चढ़ाते हैं। आयोजन में बढ़ती भीड़ को देखते हुए रायगढ़ पुलिस और गांव के युवाओं ने व्यवस्था संभाली।

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