
सैकड़ों प्रवासी पक्षियों की शरणस्थली बना ऐतिहासिक जलाशय, प्रो. सुशील दत्ता बोले- अब नहीं चेते तो खो देंगे दलपत सागर की पहचान
65 वर्षों के अध्ययन कर रहे प्रो. सुशील दत्ता की अपील- दलपत सागर को बचाने सभी आगे आए
अनिल सामंत
जगदलपुर/नवप्रदेश। बस्तर की पहचान केवल उसके घने जंगल, जलप्रपात और आदिवासी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर के हृदय में स्थित ऐतिहासिक दलपत सागर भी इस धरती की जैविक आत्मा बन चुका है। वर्षों से हजारों पक्षियों, जलीय जीवों और शोधकर्ताओं का आश्रय बना यह जलाशय अब संरक्षण की गंभीर पुकार कर रहा है।
शासकीय काकतीय महाविद्यालय के प्राध्यापक प्रोफेसर सुशील दत्ता ने लगभग छह दशक तक दलपत सागर की जैव विविधता पर अध्ययन करते हुए यहां आने वाले अनेक दुर्लभ और प्रवासी पक्षियों का दस्तावेजी अवलोकन किया है। उनके अध्ययन में स्पॉट बिल्ड पेलिकन,पलाश गल,ब्राउन हेडेड गल,रेड क्रीस्टेड पोचार्ड, बार हेडेड गूज, स्नेक बर्ड, येलो बिटर्न, ब्लैक बिटर्न, पर्पल हैरान, ग्रे हैरान, यूरेशियन स्नाईप,ग्रेट पेंटेड स्नाईप, फिशेंट टेल्ड जकाना और ब्रोंज विंग्ड जकाना जैसे पक्षियों की उपस्थिति दर्ज की गई है।
प्रो. दत्ता का कहना है कि दलपत सागर केवल जलाशय नहीं, बल्कि प्रवासी पक्षियों के लिए “स्टॉप ओवर” स्थल है, जहां वे लंबी यात्राओं के दौरान विश्राम और भोजन प्राप्त करते हैं। यह जलाशय मत्स्याखेट, शोध और स्थानीय जैव विविधता का जीवंत प्रयोगशाला भी है। यहां विभिन्न प्रकार के कीट, मछलियां और जलीय जीव पनपते हैं, जिन पर स्थानीय और बाहरी शोधार्थी लगातार अध्ययन कर रहे हैं।
लेकिन अब दलपत सागर का अस्तित्व संकट की आहट महसूस कर रहा है। प्रो. दत्ता बताते हैं कि वर्षों से नाइट्रोजन और फास्फोरस युक्त अपशिष्ट जल सीधे तालाब में पहुंचता रहा, जिससे जलीय खरपतवार तेजी से बढ़े और तालाब धीरे-धीरे उथला होने लगा। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते गंदे पानी की आवक नहीं रोकी गई तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक जलाशय अपनी प्राकृतिक पहचान खो सकता है।
उन्होंने नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि दलपत सागर केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे शहर की धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं। साथ ही उन्होंने दलपत सागर को आधिकारिक पक्षी विहार घोषित करने की मांग भी उठाई, ताकि यहां की जैव विविधता को स्थायी सुरक्षा मिल सके। अंतत: सवाल यही है—जब दुर्लभ पक्षी हजारों किलोमीटर उड़कर दलपत सागर को अपना घर मानते हैं, तो क्या जगदलपुर के नागरिक इस विरासत को बचाने आगे आएंगे?
दलपत सागर क्यों है अनमोल?
प्रवासी और दुर्लभ पक्षियों की सुरक्षित शरणस्थली,बस्तर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान,मत्स्याखेट और स्थानीय आजीविका का आधार, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के अध्ययन का प्रमुख केंद्र, जैव विविधता से भरपूर प्राकृतिक जल तंत्र, शहर के पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण स्रोत, पक्षी विहार के रूप में विकसित होने की अपार संभावनाएं बनी हुई है। प्रोफेसर सुशील दत्ता ने कहा कि उन्होंने पिछले 65 वर्षों में दलपत सागर को बदलते देखा है। बचपन में इसी जलाशय के पानी का उपयोग नहाने और पीने तक के लिए होता था। पूरे तालाब में तैरते हुए उन्होंने प्रकृति का अद्भुत संसार महसूस किया, लेकिन आज बढ़ते प्रदूषण और अतिक्रमण ने इसकी स्वाभाविक सुंदरता को चुनौती दे दी है।



