संपादकीय: अब निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त

Editorial: विपक्ष ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव रखा जो ध्वनि मत से गिर गया। इसके बाद अब विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए संसद के दोनों सदनों में उनपर महाभियोग चलाने का नोटिस दिया है जिसमें विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का आचरण पक्षपात पूर्ण और भेदभाव वाला है।
चुनाव आयोग द्वारा कराये गये एसआईआर में बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया गया है। वे सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ राज्यसभा में 63 सांसदों ने नोटिस पर दस्तखत किये हैं। वहीं लोकसभा में 130 सांसदों ने इस पर अपने हस्ताक्षर किये हैं। इसमें इंडिया गठ बंधन में शामिल न होने के बावजूद आम आदमी पार्टी के सांसदों ने भी हस्ताक्षर किये हैं। कुल मिलाकर पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लगाने के लिए कटिबद्ध है।
हालांकि संसद में बहुमत न होने के कारण विपक्ष की यह कवायद भी व्यर्थ जाएगी और यह बात विपक्ष को मालूम है लेकिन वह ऐसा करके एक नया बखेड़ा खड़ा करना चाहता है। ताकि चुनाव आयोग को बदनाम करके वह जल्द होने जा रहे। बंगाल और असम सहित आधा दर्जन राज्यों के विधानसभा चुनाव में इसका राजनीतिक लाभ उठा सके। अब देखना यह होगा कि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष द्वारा किये गये इस नोटिस पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि वे इसे मंजूरी देते हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगे आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यी जांच कमेटी बनाई जा सकती है।
जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीस या उनके द्वारा नामांकित न्यायाधीश तथा हाईकोर्ट के चीफ जस्टीस और एक मुख्य न्यायविद को शामिल किया जाएगा और यह कमेटी आरोंपो की जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट संसद में पेश करेगी और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ लाये गये महाभियोग प्रस्ताव पर चर्चा होगी और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त को भी संसद में तलब करके उनका पक्ष सुना जाएगा और इसके बाद महाभियोग प्रस्ताव पर संसद में वोटिंग कराई जाएगी। जाहिर है संसद में एनडीए को पूर्ण बहुमत प्राप्त है इसलिए यह महाभियोग प्रस्ताव भी गिर ही जाएगा।
दरअसल एसआईआर की प्रक्रिया की वजह से विपक्ष की उन राजनीतिक पार्टियों को ज्यादा पीड़ा हुई है जिन्होंने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को अपने राज्यों में घुसाकर और उन्हें तमाम मुलभूत सुविधाएं मुहैया कराकर उन्हें अपना वोट बैंक बना रखा था। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान ऐसे घुसपैठियों के नाम बड़ी संख्या में मतदाता सूचि से काटे गये हैं और मजे की बात यह है कि उन घुसपैठियों ने अपना नाम काटे जाने की चुनाव आयोग से ऐ भी शिकायत नहीं की थी। इससे सबसे ज्यादा पीडि़त बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हुई हैं।
क्योंकि बंगाल में भी लाखों की संख्या में घुसपैठिए आबाद थे। उनका नाम मतदाता सूचि से न कटे इसके लिए ममता बनर्जी ने सड़क पर उतरकर आंदोलन भी किया और एसआईआर की प्रक्रिया के खिलाफ हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया यहां तक की सुप्रीम कोर्ट में तो वे खुद भी वकील बनकर भी पहुंच गई थी किन्तु हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही उन्हें फटकार लगा दी।
इसके बाद बौखलाई ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और ममता बनर्जी की पहल पर ही पूरा विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए तैयार हो गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने के लिए ठीक वैसी ही प्रक्रिया अमल में लाई जाती है जैसी सुप्रीम कोर्ट में किसी जज को हटाने के लिए अपनाई जाती है।
जाहिर है विपक्ष के अडियल रूख को देखते हुए लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति इसकी अनुमति दे देंगे क्योंकि इसका परिणाम उन्हें पता है कि कुछ होना जाना नहीं है। उल्टे एक बार फिर विपक्ष संसद में मुंह की खाएगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक का बचा हुआ है। यदि उम्मीद तो यही है कि वे अपना शेष कार्यकाल भी अवश्य ही पूरा करेंगे।



