Bamboo Ethanol Plant India : बांस से बनेगा भविष्य का ईंधन, दुनिया के पहले बांस-आधारित इथेनाल संयंत्र से 30 हजार किसानों को जोड़ने की तैयारी

उत्तर-पूर्व भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाला दुनिया का पहला बांस-आधारित बायो-इथेनाल संयंत्र अब पूर्ण क्षमता से उत्पादन (Bamboo Ethanol Plant India) की दहलीज पर है। गोलाघाट जिले के नुमालीगढ़ में स्थापित Assam Bio Ethanol Private Limited ने अगले तीन वर्षों में 30 हजार से अधिक किसानों को अपने साथ जोड़ने का लक्ष्य तय किया है। उद्देश्य साफ है – कच्चे माल के रूप में बांस की स्थिर और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना, साथ ही ग्रामीण आय को मजबूत आधार देना।
करीब 4,930 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस अत्याधुनिक संयंत्र का उद्घाटन सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया था। फिलहाल संयंत्र स्थिरीकरण चरण में है और आने वाले कुछ सप्ताह में अपनी स्थापित क्षमता के साथ उत्पादन शुरू करेगा। इसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 49 हजार मीट्रिक टन इथेनाल की है।
यह परियोजना तकनीकी दृष्टि से भी अनोखी है। इसे दुनिया की पहली व्यावसायिक द्वितीय पीढ़ी (2G) की बायो-इथेनाल फैक्ट्री माना जा रहा है, जो गन्ना या मक्का जैसी खाद्य फसलों के बजाय बांस का उपयोग (Bamboo Ethanol Plant India) करती है। संयंत्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रूपज्योति हजारिका के अनुसार, ट्रायल रन के दौरान 99.7 प्रतिशत शुद्धता वाला फ्यूल-ग्रेड इथेनाल तैयार किया गया, जो सामान्य 99.5 प्रतिशत मानक से भी बेहतर है।
इथेनाल के साथ-साथ यह इकाई हर वर्ष 19,000 टन फरफ्यूरल, 11,000 टन एसिटिक एसिड, 32,000 टन लिक्विड कार्बन डाई आक्साइड और 25 मेगावाट ग्रीन पावर का उत्पादन भी करेगी। ‘जीरो-वेस्ट’ मॉडल पर आधारित इस संयंत्र में बांस के प्रत्येक हिस्से का उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा, जिससे अपशिष्ट लगभग शून्य रहेगा।
पूरी क्षमता से संचालन के लिए संयंत्र को प्रतिवर्ष लगभग पांच लाख मीट्रिक टन हरे बांस की आवश्यकता होगी। इसके लिए 12,500 हेक्टेयर भूमि पर 60 लाख पौधे रोपने की योजना बनाई गई है। अब तक 4,200 से अधिक किसानों का पंजीकरण किया जा चुका है और बिचौलियों को हटाकर सीधे उनके खातों में 2.4 करोड़ रुपये स्थानांतरित किए गए हैं। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि कृषि भूमि को अन्य फसलों से बदलने का दबाव नहीं डाला जाएगा, बल्कि बंजर और अप्रयुक्त जमीन की पहचान कर बांस रोपण को बढ़ावा दिया जाएगा।
बांस आपूर्ति के लिए संयंत्र के 300 किलोमीटर के दायरे को लक्षित किया गया है। इसमें असम के 16 जिले, अरुणाचल प्रदेश के चार, नगालैंड के पांच और मेघालय का एक जिला (Bamboo Ethanol Plant India) शामिल हैं। चाय बागानों की पांच प्रतिशत भूमि को गैर-चाय गतिविधियों के लिए उपयोग की अनुमति मिलने के बाद कई बागान मालिक भी इस पहल से जुड़ने लगे हैं।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह मॉडल राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को हर वर्ष लगभग 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त संबल दे सकता है। साथ ही, जब 12,500 हेक्टेयर क्षेत्र से नियमित बांस आपूर्ति शुरू होगी, तब यह इकाई पूर्ण रूप से ‘कार्बन न्यूट्रल’ होने की दिशा में बड़ा कदम माने जाएगी।
ऊर्जा, पर्यावरण और कृषि – तीनों क्षेत्रों के संगम पर खड़ा यह संयंत्र उत्तर-पूर्व भारत में औद्योगिक नवाचार और ग्रामीण सशक्तिकरण का नया अध्याय लिखने की तैयारी में है।



