संपादकीय: अनिवार्य मतदान पर सुप्रीम कार्ट की दो टूक

Editorial: देश में मतदान को अनिवार्य करने के लिए दायर की गई एक याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि वोट देने के लिए नागरिकों को मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही वोट न देने वाले लोंगो के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मतदान एक संवैधानिक अधिकार तथा लोकतांत्रिक कत्वर्य है लेकिन यह किसी पर थोपा नहीं जा सकता। गौरतलब है कि सत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के लिए लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि मतदान को अनिवार्य किया जाये और जो लोग मतदान नहीं करते उन्हें सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाये।
आखिरकार इस मांग पर जब सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि यह एक नीतिगत निर्णय है और केन्द्र सरकार चाहे तो इस पर उचित फैसला ले सकती है। यह वास्तव में केन्द्र सरकार को इस बारे में निर्णय लेना चाहिए क्योंकि चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों और मतदाताओं को जागरूक करने के लिए चलाये जाने के बावजूद हमारे देश में मतदान प्रतिशत अवसत ही रहा है।
सत प्रतिशत मतदान का सपना पूरा होता दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है जबकि लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक है कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपने मताधिकार का उपयोग करें। यदि शत प्रतिशत मतदान होता है तो इससे अच्छी और कोई बात हो ही नहीं सकती। उल्लेखनीय है कि कई चुनावों में जीत और हार का अंतर 100 -200 वोटों से लेकर कुछ हजार वोटों तक ही रहता है। जबकि हजारों की संख्या में लोग मतदान हीं नहीं करते यदि सभी मतदान करें तो इससे चुनावी नतीजे भी बेहतर होंगे और भारतीय लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होगा।



