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Supreme Court : सुनवाई में देरी पर उठे बड़े सवाल, क्या गंभीर आरोपों में भी मिल सकती है राहत

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत कक्ष में माहौल काफी गंभीर (Supreme Court) नजर आया। यूएपीए और पीएमएलए जैसे सख्त कानूनों में जमानत को लेकर चली बहस ने कानूनी हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है। अदालत में जैसे ही कसाब और हाफिज सईद का जिक्र आया, वहां मौजूद लोगों के बीच हलचल बढ़ गई। इस पूरे मामले को लेकर राजनीतिक और कानूनी गलियारों में भी लगातार प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

दिल्ली दंगा मामले से जुड़े आरोपितों की याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच कई अहम सवाल उठे। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर रही कि अगर किसी मामले की सुनवाई लंबे समय तक चलती है, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर गंभीर आरोपों में बंद आरोपितों को भी जमानत दी जा सकती है। अदालत की टिप्पणियों और सरकार की दलीलों ने इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है।

दिल्ली दंगा मामले की सुनवाई में उठा मुद्दा : Supreme Court

यह पूरा मामला 2020 दिल्ली दंगा प्रकरण के आरोपित अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद की अंतरिम जमानत याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि 25 मई को दोनों की अंतरिम जमानत पर विचार किया जा सकता है।

बड़ी पीठ को भेजा जा सकता है मामला

अदालत ने यह भी कहा कि यूएपीए मामलों में जमानत से जुड़े कानूनी सवाल को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग पर भी विचार होगा। अदालत का मानना है कि इस विषय पर पहले दिए गए अलग अलग फैसलों में मतभेद दिखाई देते हैं।

केंद्र सरकार ने रखी कड़ी दलील

केंद्र सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े मामलों को सामान्य अपराध की तरह नहीं देखा (Supreme Court) जा सकता। सरकार ने दलील दी कि केवल सुनवाई में देरी होना जमानत का आधार नहीं बन सकता।

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सालिसिटर जनरल एसवी राजू ने सवाल उठाया कि अगर कसाब जैसे मामले में सुनवाई लंबी चलती, तो क्या उसे भी सिर्फ देरी के कारण जमानत दी जा सकती थी। उन्होंने हाफिज सईद का उदाहरण देते हुए भी इसी तरह की बात कही।

अदालत में जमानत को लेकर बहस तेज

सुप्रीम Court में इससे पहले भी जमानत को लेकर अहम टिप्पणियां सामने आ चुकी हैं। हाल ही में जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा था कि जमानत नियम है और जेल अपवाद। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि सुनवाई में बहुत ज्यादा देरी हो रही हो तो राहत पर विचार किया जाना चाहिए। इसी टिप्पणी के बाद यूएपीए मामलों में जमानत के नियमों और वैधानिक प्रतिबंधों को लेकर बहस और तेज हो गई है।

गंभीर अपराध और आरोपित की भूमिका पर जोर

केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि हर मामले में आरोपित की भूमिका, अपराध की गंभीरता और सुनवाई में देरी की वजह को अलग अलग देखा (Supreme Court) जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि संसद ने ऐसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जमानत के कड़े प्रावधान बनाए हैं।

सरकार ने यह भी कहा कि अदालतों को कट्टर आतंकवाद से जुड़े आरोपितों और कम भूमिका वाले लोगों के बीच अंतर करना जरूरी है। केवल लंबी कैद को आधार बनाकर सभी मामलों में समान राहत नहीं दी जा सकती।

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