छत्तीसगढ़राजनीति

ढाई दशक से उलझती, बिखरती रही राज्य की दलित राजनीति

दलित राजनीति का जमीनी संगठन शक्तिशाली, मगर नेतृत्व कमजोर

विशेष संवाददाता
रायपुर/नवप्रदेश । chhattisgarh politics: छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति समाज की राजनीति का जमीनी आधार भले ही सशक्त रहा हो लेकिन, राजनीति के अखाड़े में लीडरशिप की ताकत कमतर ही रही। अनुसूचित जाति समाज की राजनीति को नेतृत्व देने वाले नेता कभी भी राज्य स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनाने में कामयाब नहीं हो सके। राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग की राजनीति उलझती रही, सुलझती रही, बिखरती रही। समाज के धार्मिक गुरु बेहद प्रभावशाली रहे हैं, लेकिन राजनीतिक मैदान में बीते ढाई दशक में एक भी ऐसा राजनेता उभरकर नहीं आया, जिसे समाज का सर्वमान्य लीडर कहा जा सके।

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छत्तीसगढ़ में अनुसूचित समाज की आबादी कुल 13 प्रतिशत है। मौजूदा सरकार सहित पिछली सभी सरकारों में इस समाज के दो मंत्री रहे हैं। मगर ओहदा मिलने के बाद किसी भी मंत्री ने समाज को नेतृत्व देने की कोशिश नहीं की। सभी पूर्व मंत्री क्षेत्रीय क्षत्रप बने रहे और वक्त के साथ उनकी राजनीति बोझिल होती चली गई। राज्य की राजनीति के पटल पर उभरने के बाद हाशिये पर चले जाने वाले अनुसूचित जाति वर्ग के नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। मौजूदा विधानसभा में सबसे वरिष्ठ विधायकों में से एक पुन्नूलाल मोहिले चार बार सांसद चुने जा चुके हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश में भी वे विधायक रहे।

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इसके बाद छत्तीसगढ़ में रमन सरकार के कार्यकाल में वे खाद्य मंत्री भी बने। राजनीति में मोहिले के वृहद अनुभव के बावजूद छत्तीसगढ़ में अनुसूचित वर्ग समाज को लाभ दिलाने में मोहिले नाकाम रहे। मौजूदा सरकार में खाद्य मंत्री दयालदास बघेल, कांग्रेस के डॉ शिव डहरिया और रुद्र गुरु, भाजपा विधायक डोमन लाल कोर्सेवाड़ा, रेशमलाल जांगड़े नेता भी इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते रहे, लेकिन उनकी राजनीति अनुसूचित समाज के हितों को लेकर आगे नहीं बढ़ी। अपने-अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी राजनीति में ही उलझे रहे एससी वर्ग के राजनेता। इस वर्ग से जुड़ा कोई भी राजनेता समाज का पॉवरफुल लीडर बन पाने में विफल रहा।

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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अनुसूचित वर्ग के निर्वाचित नेताओं ने कभी समाज की राजनीति ही नहीं की। मंत्री पद के आभामंडल में अनुसूचित समाज के नेता खो गए। राज्य में किसी भी अनुसूचित वर्ग के नेता के उभर न पाने की एकमात्र वजह भी यही रही। 13 फीसदी आबादी के एकजुट समाज को आज तक राज्य स्तर का सशक्त लीडर नहीं मिला।

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भाजपा सरकार में सुर्खियों में रहा बलौदाबाजार कांड

2023 में छत्तीसगढ़ में साय सरकार का कार्यकाल शुरू होने के कुछ महीनों के बाद ही बलौदाबाजार सुलग उठा। जैतखंभ में तोडफोड़ के बाद उग्र हुए सतनामी समाज के लोगों ने सोमवार को जमकर आगजनी और तोडफोड़ की। सतनामी समाज का गुस्सा इतना हिंसक हो गया कि कलेक्ट्रेट को जला दिया गया। आंदोलनकारियों ने कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया। कई सरकारी कार्यालयों में तोडफोड़ की गई। कलेक्टर और एसपी जैसे जिम्मेदार अफसरों को जान बचाने के लिये कलेक्ट्रेट छोड़कर भागना पड़ा। हजारों प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया।

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जून 2024 में घटी इस घटना के बाद से बड़ी संख्या में सतनामी समाज के लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इस मामले को लेकर सतनामी समाज कई बार पुलिस और प्रशासन के रवैये से नाराज है। बलौदाबाजार घटना से भाजपा और सतनामी समाज के बीच पैदा हुई चौड़ी खाई को पाटने के लिये ही साय सरकार के केबिनेट विस्तार में गुरु साहेब को मंत्री पद दिया गया है। हालांकि, इससे बलौदाबाजार कांड को लेकर उपजी नाराजगी पर कोई असर नहीं पड़ा है। सतनामी समाज आज भी इस मामले को लेकर भाजपा से नाराज है।

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जोगी के काट में भूपेश ने कई सतनामी नेता मैदान में उतारे

अनुसूचित जाति वर्ग का जमीनी सामाजिक ढांचा जितना एकजुट रहा, उसकी तुलना में राजनीतिक नेताओं के बीच एकजुटता का अभाव देखा गया। खास बात यह रही कि कांग्रेस के दो बड़े नेता काफी समय तक अपनी ढपली, अपना राग आलापने वाले अनुसूचित वर्ग के जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक हथियार बनाते रहे। भाजपा इसमें पूरी तरह नाकाम रही। राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी हर चुनाव में भूपेश बघेल को हराने के लिये पाटन क्षेत्र में आकर सतनामी समाज को एकजुट करते हुए हराने की अपील करते रहे।

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कांग्रेस में ही रहकर इशारों-इशारों में भूपेश को निपटाने की जोगी की अपील का असर भी हुआ। इससे होने वाले डैमेज कंट्रोल को साधने के लिये भूपेश को काफी मशक्कत करना पड़ा। बाद में भूपेश ने डॉ शिव डहरिया, गुरु रुद्र कुमार सरीखे कई सतनामी समाज के नेताओं को साधकर अपनी राजनीति चमकाते हुए जोगी की हैसियत अनुसूचित वर्ग के बीच हाशिये पर लाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी।

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