डीएमएफ का फंड यानि देशव्यापी दुरुपयोग की गारन्टी : यशवंत धोटे - Navpradesh

डीएमएफ का फंड यानि देशव्यापी दुरुपयोग की गारन्टी : यशवंत धोटे

रायपुर। डीएमएफ यानि डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड अर्थात जिला खनिज विकास निधि। यानि जिले में खनिज संसाधनों से मिलने वाली रायल्टी के देश व्यापी दुरुपयोग में छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं है। पिछली सरकार में इस पर कलेक्टर का एकाधिकार होता था, अब नई सरकार ने नया कुछ करने के उद्देश्य से जिले के प्रभारी मंत्री को इस फं ड का प्रभारी बना दिया है। यानि पहले एक आदमी इसका दुरुपयोग करता था अब दो लोग मिलकर करेंगे। जल, जंगल, जमीन के पैरोकार तो डीएमएफ के स्ट्रक्चर पर ही सवाल खड़ा करते हैं। खनिज संसाधनों से भरपूर क्षेत्र को हथिया कर वहां के लोगों को विकास का झुनझुना पकड़ा देने का नाम है खनिज विकास निधि। दरअसल आठ साल पहले बने इस कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है कि खनिजों के खनन से मिलने वाली रायल्टी की राशि को खनन प्रभावित क्षेत्र के विकास में लगाया जाये। मसलन उस क्षेत्र में स्कूल, अस्पताल, सड़क, पानी, बिजली रोजी रोजगार ,खेती के लिए पानी के अलावा वे सारी बुनियादी सुविधाएं विकसित होना चाहिए जो एक आम आदमी की जरूरत हैं। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इसे रायगढ़ जिले के घटनाक्रम से समझा जा सकता है। अधिकारिक सूत्रों की यदि माने तो राज्य के एक दो जिलों को छोड़ शेष 25 जिलों में कोयला, डोलोमाइट, आयरन ओर, बाक्साइट, टीन, रेती के अलावा अन्य ऐसे कीमती खनिजों का खनन होता है। जिससे रायल्टी के रूप में सरकार को सालाना 1200 करोड़ रुपए का राजस्व आता है, जो डीएमएफ कहलाता है। रायगढ़ जिले की तमनार कोल माइन्स से पिछले साल 183 करोड़ रुपए की रायल्टी कलेक्टर रायगढ़ को मिली। लेकिन इसका खर्च कहां हुआ इसे देखा जाय। वैसे तो कोल माइन्स के 10 किलोमीटर के एरिया में आने वाले गावंों में यह पैसा खर्च होना था, लेकिन 50 किलोमीटर दूर रायगढ़ जिला मुख्यालय में इस पैसे से लिफ्ट लगवा ली गई। कैलो नदी के दोनो तटों पर मरीन ड्राइव बना दिया गया, पिछली सरकार की विकास यात्रा के लिए सड़कों का पेच वर्क और हर साल होने वाला चक्रधर समारोह भी इसी पैसे से कर लिया गया। यहां तक कि चुनाव के दरम्यान जिला प्रशासन द्व्रारा कराई जाने वाली विडियो ग्राफ ी भी इसे पैसे से कर ली गई। साथ ही 183 करोड़ की वसूली के एवज में 200 करोड़ रुपए खर्च करने का प्लान भी बना दिया गया। इस जिले की एक पूर्व विधायक सुनीति राठिया के गांव में स्कूल की बाउन्ड्री भी इसी पैसे से बन गई, जबकि यह गांव इस सीमा में है ही नहीं। दरअसल जिन कामों में कमीशनखोरी की गुंजाइश रही वह सारे काम हो गए। अब इस खनन क्षेत्र में खनन शुरू होने से शुरू हुई बीमारियों पर नजर डालें तो मामला बहुत गंभीर है। दरअसल यहां जब से कोल की माइनिंग शुरू हुई पानी में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ गई। जिससे इस क्षेत्र के दो गांव सरईटोला और मूढ़ा गांव की पूरी आबादी कुबड़ी हो गई है। यानि महिला पुरुषों के कूबड़ निकल गए हैं। आंगनबाड़ी के बच्चों के दांत काले हो गए हैं। यहां पर एक वाटर ट्रीटमेन्ट प्लान्ट के अलावा किसानों को सिंचाई के लिए पानी और रोजगार की दरकार थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और न ही हो रहा है। जनचेतना के सदस्य राजेश त्रिपाठी का कहना है कि मनरेगा की तर्ज पर जब तक डीएमएफ का सोशल आडिट सिस्टम लागू नहीं होगा तब तक इसके दुरुपयोग को नहीं रोका जा सकता। इसके लिए ग्रामसभा से माइक्रोप्लान बनना चाहिए।
राजधानी रायपुर से महज 70 किलोमीटर की दूरी पर बलौदा बाजार जिले को सीमेन्ट प्लान्टों का हब इसलिए कहा जाता है कि यहां पर डोलामाइट की खदाने हैं। इस जिले में लासर्न एंड टुब्रो, इमामी, अल्ट्राटेक, जैसी सात सीमेन्ट कम्पनियों की चिमनियों से निकलने वाली राख ने किसानों की हजारों एकड़ जमीन को बंजर तो बना दिया है लेकिन इन जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए कोई उपाय डीएमएफ फंड से नहीं किया गया, अलबत्ता इस फंड से नया रायपुर में हरियर छत्तीसगढ़ के नाम से पेड़ लगवा दिए गए। यहां के आसपास के 40 गावों में लोगों को चर्मरोग की शिकायत हैं। यहां के लोगों का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ के लिए जब सरकारी खर्च का प्रावधान है तो डीएमएफ के फंड से नया मानव संसाधन तैयार होना चाहिए। ग्राम पंचायत को इसकी जानकारी नहीं दी जाती।
सबसे अजीबो गरीब मामला तो नक्सल प्रभावित दन्तेवाड़ा जिले का है, जहां डीएमएफ के फं ड से बीपीओ की बिल्डिंग तैयार कर फ र्नीचर लगा दिया गया, लेकिन उसमें बैठने वाला कोई नहीं है। बल्कि इस फंड के दुरुपयोग करने वाले तत्कालीन कलेक्टर ओपी चौधरी को यूपीए की सरकार ने बेस्ट ब्यूरोके्रट्स का इनाम दिया और केन्द्र में एनडीए की और राज्य में भाजपा की सरकार रहते- रहते वे कलेक्टरी छोड़ भाजपा में शामिल हो गए। चुनाव लड़े और हार भी गए लेकिन दन्तेवाड़ा जिले में डीएमएफ फं ड से हुए कामकाज अब घोटालों के रुप में सामने आ रहे हैं। दरअसल इस जिले में देश की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनी एनएमडीसी दन्तेवाड़ा जिले के बचेली और किरंदुल में आयरन ओर का खनन करती है। इस लिहाज से सर्वाधिक रायल्टी यहां दन्तेवाड़ा जिले को मिलती है। दरअसल यहां महिला सशक्तीकरण के नाम पर बड़ा खेल खेल दिया गया। महिलाओं के लिए 300 से अधिक ई रिक्शे खरीदे गये। जबकि सड़क पर 30 भी नहीं हैं। शिक्षा के नाम पर लाइवलीहुड कालेज, आवासीय विद्यालय जैसे उपक्रम तो तैयार हो गए लेकिन उसकी उपयोगिता पर सवाल खड़े हो गए।
स्वयं सेवी संगठन सार्थक के सचिव लक्ष्मी चौहान का कहना है इस फंड के लिए सरकार स्टेक होल्डर बने। इसका यदि दुरुपयोग नहीं रुका तो खनन के लिए आबादी तो उजड़ेगी लेकिन समावेशी विकास का सपना चूर-चूर हो जाएगा। इस सबसे अलग नदी घाटी मोर्चा के संयोजक गौतम बन्दोपाध्याय तो डीएमएफ की अवधारणा पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं। वे कहते हैं विकास के नाम पर पहले गांव उजड़ते हैं फि र जल, जंगल, जमीन बिकती है और जब प्रभावित की बारी आती है तो सरकार का पाखंड शुरू हो जाता है। इसलिए डीएमएफ जैसी स्कीम से खनन प्रभावित क्षेत्र के लोगों का भला होगा ऐसा दिखता नहीं है। जबकि छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन के सयोजंक आलोक शुक्ला को नई सरकार से यह उम्मीद है कि अब प्रभारी मंत्री को इसका प्रभार दिए जाने से कुछ बदलाव आएगा। उनका कहना है इससे पहले डीएमएफ कलेक्टरों की पाकिट मनी हुआ करती थी।

कोरबा जिले में खेला गया अजीबो-गरीब खेल

कोरबा जिले को डीएमएफ से सालाना 300 करोड़ रुपए मिलता है लेकिन उसको दुरुपयोग की गाथा भी अलहदा है। इस पैसे से 248 करोड़ रुपए का एक एजुकेशन हब खड़ा कर दिया गया है जिसमें मल्टीलेवल पार्किंग से आडिटोरियम जैसे इन्फ्रास्च्रक्चर खड़े कर दिए गए, जबकि सीएसआर से 250 करोड़ से बने इंजीनियरिंग कालेज में 25 बच्चे नहीं पढ़ पा रहे और अब उसे प्लास्टिक इंजीनियरिंग के नाम पर चलाया जा रहा है। अजीबो गरीब तो यह है कि डीएमएफ के पैसों से तीन सौ करोड़ रुपए के उज्जवला गैस कनेक्शन बांट दिए गए हैं। कोयले पर 15 फ ीसदी सेस लगता है जिसमें साढ़े सात फ ीसदी पैसा पर्यावरण पर खर्च करने की बाध्यता है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। बल्कि कोरबा राज्य का सबसे प्रदूषित जिला है। लगभग 1200 मीट्रिक टन सालाना कोयला खनन के चलते आसपास के 200 गांव प्रभावित हैं। दरअसल इस जिले की अधिकांश जमीन फ ारेस्ट की है और इस फ ारेस्ट से एक ग्रामीण परिवार सालाना 60 से 70 हजार रुपए की वनोपज बेचता है, लेकिन जैसे ही गांव कोल खनन क्षेत्र में आता है आदिवासियों को गांव से बेदखल कर दिया जाता है। लेकिन उनकी रोजी रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं रहती।


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