Hindi Pakhwada : रस्म अदायगी तक सीमित न रहे हिन्दी पखवाड़ा -

Hindi Pakhwada : रस्म अदायगी तक सीमित न रहे हिन्दी पखवाड़ा

Hindi Pakhwada : Hindi Pakhwada should not be limited to rituals

Hindi Pakhwada

योगेश कुमार गोयल। Hindi Pakhwada : भले ही आज हमारे देश में ही कुछ लोग हिन्दी के उपयोग को लेकर कभी-कभार बेवजह का विवाद खड़ा कर अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास करते दिखते हैं लेकिन हर भारतीय के लिए गर्व की बात यह है कि हिन्दी को चाहने वालों की संख्या अब दुनियाभर में लगातार बढ़ रही है। डा. फादर कामिल बुल्के ने संस्कृत को मां, हिन्दी को गृहिणी और अंग्रेजी को नौकरानी बताया था। आयरिश प्रशासक जॉन अब्राहम ग्रियर्सन को भारतीय संस्कृति और यहां के निवासियों के प्रति अगाध प्रेम था, जिन्होंने हिन्दी को संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि बताया था। दूसरी ओर हमारे ही देश में कुछ लोग कुतर्क देते हैं कि भारत सरकार योग को तो 177 देशों का समर्थन दिलाने में सफल हो गई लेकिन हिन्दी के लिए 129 देशों का समर्थन भी नहीं जुटा सकी। हालांकि इस प्रकार की नकारात्मक बातों से न हिन्दी का कुछ भला होने वाला है और न ही उसका कोई बिगडऩे वाला है। ऐसे व्यक्ति हिन्दी की बढ़ती ताकत का यह सकारात्मक पक्ष बहुत चालाकी से नजरअंदाज कर देते हैं कि आज विश्वभर में करोड़ों लोग हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी को लेकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने एक बार कहा था:-

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अर्थात् अपनी भाषा से ही उन्नति संभव है क्योंकि यही सारी उन्नतियों का मूलाधार है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा का निवारण संभव नहीं है। देश-विदेश के बड़े-बड़े विद्वानों ने हिन्दी भाषा के महत्व को समय-समय पर अपने शब्दों में व्यक्त किया है। पुरुषोत्तमदास टंडन मानते थे कि जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में भी हिन्दी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जनसम्पर्क के लिए हिन्दी (Hindi Pakhwada) को ही सबसे उपयोगी भाषा मानते थे। हिन्दी भाषा के महत्व को स्वीकारते हुए वह कहा करते थे कि सम्पूर्ण भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है, जिसे जनता का बड़ा भाग पहले से ही जानता-समझता है और राज व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

गांधी जी कहते थे कि दिल की कोई भाषा नहीं है, दिल दिल से बातचीत करता है और राष्ट्रभाषा के बिना एक राष्ट्र गूंगा है। अमेरिका के जाने-माने चिकित्सक वॉल्टर चेनिंग का कहना था कि विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी को देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत मानते थे जबकि राहुल सांस्कृत्यायन के अनुसार संस्कृत की विरासत हिन्दी को जन्म से ही मिली है। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीनÓ का कहना था कि राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिन्दी ही जोड़ सकती है।

महात्मा गांधी के हिन्दी प्रेम को परिभाषित करता वर्ष 1917 का एक ऐसा किस्सा सामने आता है, जब कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन के मौके पर बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रभाषा प्रचार संबंध कांफ्रैंस में अंग्रेजी में भाषण दिया था और गांधी जी ने उनका वह भाषण सुनने के पश्चात् उन्हें हिन्दी का महत्व समझाते हुए कहा था कि वह ऐसा कोई कारण नहीं समझते कि हम अपने देशवासियों के साथ अपनी ही भाषा में बात न करें। गांधी जी ने कहा था कि अपने लोगों के दिलों तक हम वास्तव में अपनी ही भाषा के जरिये पहुंच सकते हैं।

दरअसल हिन्दी ऐसी भाषा है, जो प्रत्येक भारतीय को वैश्विक स्तर पर सम्मान दिलाती है। बहुत सारे देशों में अब वहां की स्थानीय भाषाओं के साथ हिन्दी भी बोली जाती है। इसके अलावा दुनिया के सैंकड़ों विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जाती है और यह वहां अध्ययन, अध्यापन तथा अनुसंधान की भाषा भी बन चुकी है।

दुनियाभर में आज करीब 75 करोड़ व्यक्ति हिन्दी बोलते हैं और जिस प्रकार वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की स्वीकार्यता निरन्तर बढ़ रही है, उसे देखते हुए यह कहना असंगत नहीं होगा कि अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं, जब हमारी राजभाषा हिन्दी चीन की राजभाषा चीनी को पछाड़कर शीर्ष पर पहुंच जाएगी। विश्वभर में हमारी हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री ‘बॉलीवुड’ का नाम है, जहां हर साल करीब डेढ़ हजार फिल्में बनती हैं और ये फिल्में भारत के अलावा विदेशों में भी खूब पसंद की जाती हैं।

यही कारण है कि बॉलीवुड सितारे अक्सर अपनी फिल्मों के प्रचार-प्रसार के लिए अब विदेशों में शो आयोजित करते हैं। यूएई में हिन्दी एफएम चैनल वहां के लोगों की खास पसंद हैं। जब हम ऐसे-ऐसे देशों में भी हिन्दी (Hindi Pakhwada) को भरपूर प्यार, स्नेह, सम्मान मिलता देखते हैं, जो अपनी मातृभाषाओं को लेकर बेहद संवेदनशील रहते हैं और उसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़कर देखते हैं तो यह वाकई हम भारतीयों के लिए गौरवान्वित करने वाली उपलब्धि ही है।

आज दुनिया का हर वह कोना, जहां भारतवंशी बसे हैं, वहां तो हिन्दी धूम मचा ही रही है। तो आइए, आज हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांग सुंदर बनाने का संकल्प लेकर डा. राजेन्द्र प्रसाद के इसी सपने को साकार करने का हरसंभव प्रयास करें।

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