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Higher Education : सरकारी कालेजों के सोशल आडिट में बड़ा बदलाव, अब एक कालेज के अधिकारी करेंगे दूसरे कालेज की जांच

छत्तीसगढ़ के सरकारी कालेजों में सोशल आडिट की व्यवस्था में बड़ा बदलाव किया (Higher Education) गया है। अब तक सेवानिवृत्त होने वाले प्राचार्यों के कार्यकाल की वित्तीय और प्रशासनिक जांच के लिए उच्च शिक्षा संचालनालय अलग से टीम गठित करता था, लेकिन अब यह जिम्मेदारी सरकारी कालेजों के अधिकारियों को ही सौंपी जाएगी। नई व्यवस्था के तहत एक सरकारी कालेज के अधिकारी दूसरे सरकारी कालेज का सोशल आडिट करेंगे। उच्च शिक्षा संचालनालय ने इसके लिए प्रदेशभर के कालेजों की टीमों और निरीक्षण कार्यक्रम का आदेश जारी कर दिया है।

यह बदलाव उच्च शिक्षा विभाग की जांच प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि नई व्यवस्था लागू होते ही उच्च शिक्षा जगत में इसे लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है। कई शिक्षकों और अधिकारियों का मानना है कि इससे सोशल आडिट की प्रक्रिया में तेजी आएगी, जबकि कुछ लोग निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल भी उठा रहे हैं।

प्राचार्य के सेवानिवृत्त होने के बाद होता है सोशल आडिट Higher Education

सरकारी कालेजों में किसी प्राचार्य के सेवानिवृत्त होने के बाद उनके पूरे कार्यकाल का सोशल आडिट कराया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान कालेज में हुए वित्तीय व्यय, निर्माण कार्य, खरीदी, प्रशासनिक निर्णयों और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की विस्तार से जांच की जाती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी कार्य शासन के निर्धारित नियमों, वित्तीय प्रावधानों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के अनुरूप हुए हैं या नहीं।

इस जांच में किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता, प्रक्रिया संबंधी त्रुटि या प्रशासनिक लापरवाही मिलने पर संबंधित बिंदुओं का उल्लेख रिपोर्ट में किया जाता है। यदि सभी कार्य संतोषजनक पाए जाते हैं, तो संबंधित प्राचार्य को अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया जाता है।

एनओसी मिलने के बाद आगे बढ़ती है पेंशन प्रक्रिया

उच्च शिक्षा विभाग में सोशल आडिट की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसके पूरा होने के बाद ही सेवानिवृत्त प्राचार्य को अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया जाता है। एनओसी मिलने के बाद ही पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों से जुड़ी औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यही कारण है कि सोशल आडिट को विभागीय व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है।

अब तक यह पूरी प्रक्रिया उच्च शिक्षा संचालनालय की ओर से गठित विशेष टीमों के माध्यम से पूरी कराई (Higher Education ) जाती थी। संचालनालय संबंधित कालेजों में अधिकारियों की टीम भेजता था, जो दस्तावेजों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करती थी।

अब दूसरे कालेज के अधिकारी करेंगे जांच

नई व्यवस्था के तहत अब अलग से टीम गठित करने के बजाय प्रदेश के सरकारी कालेजों के अधिकारियों को ही सोशल आडिट की जिम्मेदारी दी गई है। यानी एक कालेज के अधिकारी दूसरे कालेज में जाकर वित्तीय और प्रशासनिक रिकार्ड की जांच करेंगे। उच्च शिक्षा संचालनालय ने इसके लिए प्रदेशभर के कालेजों की सूची, निरीक्षण दल और आडिट कार्यक्रम जारी कर दिया है, ताकि तय समय सीमा में प्रक्रिया पूरी की जा सके।

विभाग का मानना है कि इससे सोशल आडिट की प्रक्रिया अधिक तेज और व्यावहारिक होगी। साथ ही संचालनालय पर अलग से टीम गठित करने का प्रशासनिक बोझ भी कम होगा।

नई व्यवस्था पर शुरू हुई चर्चा

हालांकि नई प्रणाली लागू होने के साथ ही उच्च शिक्षा जगत में इसे लेकर चर्चा तेज हो गई है। कुछ शिक्षाविदों का मानना है कि यदि आडिट करने वाले अधिकारी पूरी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ काम करते हैं तो व्यवस्था प्रभावी साबित (Higher Education) हो सकती है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि कालेज स्तर पर अधिकारियों के बीच आपसी परिचय या प्रशासनिक संबंध होने के कारण निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि नई व्यवस्था व्यवहार में कितनी प्रभावी साबित होती है और इससे सोशल आडिट की गुणवत्ता पर क्या असर पड़ता है।

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