High Court : देरी पर अदालत सख्त, नक्सल मामले में सरकार की अपील सीधे खारिज

बिलासपुर हाईकोर्ट में नक्सल मामले से जुड़ी सुनवाई के बाद कानूनी हलकों में काफी (High Court) चर्चा रही। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर अपील पर सख्त रुख अपनाते हुए साफ कहा कि सिर्फ फाइलों के घूमते रहने का हवाला देकर देरी को सही नहीं ठहराया जा सकता। फैसले के बाद कोर्ट परिसर में भी इस मामले को लेकर वकीलों और पक्षकारों के बीच बातचीत होती रही।
मामला नारायणपुर के चर्चित प्रकरण से जुड़ा है, जिसमें आरोपियों को मिली डिफॉल्ट जमानत को चुनौती देने के लिए राज्य सरकार हाईकोर्ट पहुंची थी। लेकिन तय समयसीमा के काफी बाद अपील दाखिल किए जाने पर अदालत ने राहत देने से इनकार कर दिया।
182 दिन की देरी पर उठे सवाल : High Court
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने पाया कि राज्य सरकार की ओर से अपील 182 दिन की देरी से दायर की गई थी।
कोर्ट ने इस देरी को अस्पष्टीकृत और लापरवाहीपूर्ण माना। इसी आधार पर देरी माफी आवेदन को अस्वीकार करते हुए अपील को भी समयसीमा से बाधित मानकर खारिज कर दिया गया।
नारायणपुर के नक्सल मामले से जुड़ा है मामला
जानकारी के मुताबिक यह प्रकरण नारायणपुर जिले के ओरछा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। इस केस में चंपा कर्मा, मांगी मंडावी, संकू मंडावी और लच्छू मंडावी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, आर्म्स एक्ट और गैरकानूनी गतिविधि निवारण कानून की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।
विशेष न्यायाधीश एनआईए एक्ट और अनुसूचित अपराध न्यायालय नारायणपुर ने सितंबर 2025 में आरोपियों को डिफॉल्ट जमानत दे दी थी। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।
सरकार ने बताई फाइल प्रक्रिया की वजह
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि विधि विभाग से प्रस्ताव आने, मंजूरी मिलने और दस्तावेज जुटाने जैसी प्रक्रियाओं में समय लग गया।
सरकार की ओर से कहा गया कि प्रशासनिक और विभागीय औपचारिकताओं की वजह से अपील समय पर दाखिल (High Court) नहीं हो सकी। लेकिन अदालत ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना।
अदालत ने कहा सब पर बराबर लागू है कानून
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समयसीमा का कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है। अदालत ने साफ कहा कि केवल रेड टेप या फाइल प्रक्रिया का हवाला देकर सरकार को विशेष राहत नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि देरी माफी कोई अधिकार नहीं बल्कि अपवाद की स्थिति होती है। इसके लिए ठोस और भरोसेमंद कारण जरूरी होते हैं। अदालत के मुताबिक शासन देरी को लेकर संतोषजनक वजह पेश नहीं कर सका।
सरकारी मशीनरी पर भी जताई नाराजगी
खंडपीठ ने कहा कि सरकारी विभागों पर विशेष जिम्मेदारी होती है कि वे समयसीमा के भीतर गंभीरता और तत्परता (High Court) से काम करें। यदि सरकारी तंत्र लापरवाही करता है तो उसका फायदा उसे नहीं दिया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ अदालत ने देरी माफी आवेदन खारिज कर दिया और राज्य सरकार की अपील भी स्वतः निरस्त मानी गई।



