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Gujarat Wildlife Cheetah Project : घास के मैदान में दौड़ेंगे चीते, लेकिन क्या इस बड़े प्रयोग के लिए पर्याप्त है मौजूदा व्यवस्था

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में एक नई वन्यजीव परियोजना को लेकर उत्साह और बहस दोनों साथ साथ चल (Gujarat Wildlife Cheetah Project) रहे हैं। दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले जीव को यहां बसाने की तैयारी अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। वन्यजीव प्रेमी इसे ऐतिहासिक कदम मान रहे हैं, वहीं स्थानीय समुदाय और विशेषज्ञ कुछ अहम सवाल भी उठा रहे हैं।

इस योजना के तहत चीतों को नया घर तो मिलने जा रहा है, लेकिन इसके साथ चरागाहों, स्थानीय पशुपालकों और प्राकृतिक आवास की क्षमता को लेकर चर्चा तेज हो गई है। आने वाले महीनों में यह परियोजना देश की सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव पहलों में से एक बन सकती है।

गुजरात बनेगा दूसरा चीता राज्य : Gujarat Wildlife Cheetah Project

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने कच्छ के बन्नी घास के मैदान में शुरुआती चरण में चार चीतों को बसाने की मंजूरी दे दी है। अंतिम स्वीकृति मिलने के बाद जुलाई या अगस्त में दो नर और दो मादा चीते यहां लाए जा सकते हैं। इस परियोजना के शुरू होने के बाद मध्य प्रदेश के बाद गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बन जाएगा जहां चीता संरक्षण कार्यक्रम संचालित होगा।

केन्या से आएंगे नए मेहमान

जानकारी के अनुसार गुजरात लाए जाने वाले चीते केन्या से आएंगे। यह निर्णय इसलिए लिया गया है ताकि पहले से मौजूद चीता आबादी से अलग एक नई आबादी विकसित की जा सके। वन विभाग की योजना अगले एक वर्ष में चरणबद्ध तरीके से चीता संख्या बढ़ाने की है। भविष्य में यहां लगभग 12 चीतों की आबादी विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।

क्यों खास है बन्नी घास का मैदान

Banni Grasslands एशिया के सबसे बड़े घास के मैदानों में गिना जाता है। यह क्षेत्र 2600 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है और यहां घास की कई प्रजातियां पाई (Gujarat Wildlife Cheetah Project) जाती हैं। सदियों से यह इलाका पशुपालन और दुग्ध उत्पादन का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां रहने वाला मालधारी समुदाय लंबे समय से इस पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा रहा है और चरागाहों के संरक्षण में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।

चरागाहों के सामने क्या चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि चीता संरक्षण और स्थानीय चरागाह व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। हालांकि परियोजना के लिए फिलहाल लगभग 500 हेक्टेयर क्षेत्र को घेरकर सुरक्षित किया गया है, लेकिन जंगली चीतों की प्राकृतिक जरूरतें इससे कहीं अधिक व्यापक होती हैं।

सामान्य परिस्थितियों में चीते सैकड़ों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विचरण करते हैं। यही कारण है कि कुछ विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या सीमित क्षेत्र में शुरू की जा रही यह योजना भविष्य में सफल हो पाएगी।

शिकार की उपलब्धता बढ़ाने की तैयारी

चीतों के लिए पर्याप्त शिकार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विशेष तैयारी की जा रही है। योजना के तहत दूसरे वन्यजीव क्षेत्रों से काले हिरण लाने की प्रक्रिया भी चल रही है। इसके अलावा बन्नी क्षेत्र में पहले से मौजूद नीलगाय, चिंकारा और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीव भी चीतों के लिए संभावित शिकार आधार का हिस्सा बन सकते हैं।

असली परीक्षा अभी बाकी

फिलहाल चीते खुले जंगल में नहीं बल्कि नियंत्रित और सुरक्षित बाड़े में रखे जाएंगे। यहां उनके स्वास्थ्य, अनुकूलन और प्रजनन पर निगरानी (Gujarat Wildlife Cheetah Project) रखी जाएगी। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब चीते खुले घास के मैदानों में स्वाभाविक रूप से रह सकेंगे और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संतुलन स्थापित कर पाएंगे। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि बन्नी घास का मैदान चीतों के लिए स्थायी और सफल आवास बन पाता है या नहीं।

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