Election Commission : चुनावी रिफॉम्र्स की फिर वकालत - Navpradesh

Election Commission : चुनावी रिफॉम्र्स की फिर वकालत

Election Commission: Advocating electoral reforms again

Election Commission

प्रो. श्याम सुंदर भाटिया। Election Commission : आजादी के अमृत महोत्सव बरस में चुनाव आयोग और शक्तिशाली होना चाहता है। 72 साल के अपने लंबे एवम् कटु अनुभवों के आधार पर इलेक्शन कमीशन ने बड़े बदलाव की कार्ययोजना को मूर्त रूप दिया है। नए मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार की अध्यक्षता में हुई मैराथन मीटिंग में छह सिफ ारिशों की केन्द्र सरकार से प्रबल संस्तुति की गई है। बेशक, ये सारे प्रस्ताव अनमोल हैं। मसलन- एक उम्मीदवार- एक सीट का वक्त आ गया है। ओपेनियन और एग्जिट पोल पर रोक लगाई जानी चाहिए। राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार आयोग को मिलना चाहिए।

आधार को वोटर आईडी से लिंक किया जाए। पात्र लोगों को वोटर के रूप में पंजीकृत होने के लिए चार कटऑफ तिथियों के नियम को अधिसूचित किया जाए। 2000 से ज्यादा के सभी चंदों के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने के लिए फ ॉर्म 24 ए में संशोधन की भी दरकार है। दुनिया भर में भारत के चुनाव आयोग की छवि निष्पक्ष है। वल्र्ड के बहुतेरे देश आयोग के आला अफ सरों को अपने यहां ट्रेनिंग के लिए आमंत्रित करते हैं। यदि केन्द्र सरकार फ ौरी तौर पर इन सिफ ारिशों पर सहमत हो जाती है तो यह वक्त बताएगा कि इलेक्शन कमीशन और कितना पारदर्शी हो जाएगा?

सियासी दलों से लेकर वोटर्स तक का कितना नफ ा-नुकसान होगा? इन छह सुझावों के पीछे चुनाव आयोग की नीयत नि:संदेह साफ है। आयोग इलेक्शन में बेजां वक्त और धन नहीं खर्च करना चाहता है, बल्कि चुनाव को मित्तव्ययी और पारदर्शी बनाना चाहता है। 18 साल के युवक को मतदाता पहचान पत्र दिलाना इसके एजेंडे में सर्वोच्च है ताकि वोटिंग परसेंटेज में इजाफा हो सके। हालांकि यह भी चर्चा में है, पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव संग-संग होने चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी इसके प्रबल पैरोकार है। इस संदर्भ में विस्तार से चर्चा फि र करेंगे।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Election Commission) के तहत आप एक या दो नहीं, बल्कि आपको इससे भी ज्यादा सीटों से एक साथ चुनाव में लडऩे की आजादी थी। अधिनियम की धारा 33 पर सवाल उठने लगे तो 1996 में धारा 33 में संशोधन किया गया। अब धारा 33 (7) के अनुसार कोई भी उम्मीदवार केवल दो सीटों पर ही एक साथ चुनाव लड़ सकता है। 1957 के आम चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक साथ यूपी के तीन लोकसभा क्षेत्रों- लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से अपना भाग्य आजमाया। 1980 में मैडम इंदिरा गांधी ने रायबरेली और मेडक से लड़ीं और दोनों सीटों से विजयी रहीं।

उन्होंने रायबरेली को चुना और मेडक सीट पर उपचुनाव हुआ। आयोग बार-बार होने वाले उपचुनाव को नहीं चाहता है, क्योंकि समय और धन बर्बाद होते हैं। इसीलिए आयोग ने एक प्रत्याशी- एक सीट की प्रबल संस्तुति की है। चुनाव प्रहरी ने 2004 में भी यह अनमोल सुझाव दिया था कि यदि इसे स्वीकार नहीं किया जाता है तो कानून में एक स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए, जिसके तहत कोई भी उम्मीदवार दो सीटों पर जीतता है तो छोड़ी गई सीट के उपचुनाव का सारा खर्च विजयी प्रत्याशी को खुद वहन करना होगा। आयोग का यह सुझाव भी फिलहाल ठंडे बस्ते में है।

ताऊ तीनों से हारे तो एनटीआर की बल्ले-बल्ले

सियासत के दिग्गज- लालकृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव भी समय-समय पर एक से ज्यादा सीटों पर लड़े। हारे। जीते। 1985 में एनटी रामाराव और 1991 में देवीलाल का चुनावी नतीजा बड़ा दिलचस्प रहा। दोनों दिग्गज एक साथ तीन-तीन सीटों पर लड़े लेकिन एनटीआर को तो जनता ने तीनों सीटों पर विजयश्री का सेहरा पहना दिया, लेकिन ताऊ को हरियाणा की आवाम ने तीनों सीटों पर हरा दिया। दरअसल ये सियासीदां हार के डऱ से दूसरी सुरक्षित सीट भी चुनते हैं। उदाहरण के तौर पर 2019 में श्री राहुल गांधी को अमेठी में केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से कड़ी चुनौती मिली तो राहुल गांधी ने केरल में वायनाड को सुरक्षित सीट के तौर पर चुना। चुनाव आयोग 18 बरस पूर्व भी जनप्रतिनिधित्व एक्ट की धारा 33(7) में संशोधन प्रस्ताव कर चुका है।

ओपेनियन-एग्जिट पोल पर उठते रहे सवाल

लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की चुनावों में भी अहम भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। चुनाव लोकसभा का हो या विधानसभा का, ओपेनियन और एग्जिट पोल चुनिंदा क्षेत्रों और वोटरों की पसंद और नापसंद पर होते हैं। उल्लेखनीय है, चुनावी मौसम आते ही सर्वे की भरमार लग जाती है। कोई कहता है कि बीजेपी को इतने वोट मिलेंगे तो कोई कहता है कि कांग्रेस को इतने वोट मिलेंगे। इन अलग-अलग सर्वे को मुख्यत: दो भागों में बांटा जाता है। दिल्ली, पश्चिम बंगाल और पंजाब में समय-समय पर सर्वे को देखने का चश्मा अलग-अलग रहा। दरअसल ये सर्वे जमीनी हकीकत को सूंघ नहीं पाते हैं। सर्वे और नतीजे भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। कई बार सर्वे औंधे मुह गिरते हैं। ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल। कांग्रेस तो चुनाव आयोग से पहले ही इन पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर चुकी है।

पंजीकरण रद्द करने का मिले अधिकार

चुनाव आयोग को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29 ए राजनीतिक दलों को पंजीकृत करने का हक तो देती है, लेकिन किसी पंजीकृत पार्टियों का पंजीयन रद्द करने की शक्ति नहीं है। आयोग की यह डिमांड भी लंबे समय से पेंडिंग है। उल्लेखनीय है, आयोग में 21 हजार से अधिक गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। आयोग का मत है, ये दल सिर्फ रजिस्ट्रेशन कराते हैं, लेकिन कभी चुनाव नहीं लड़ते हैं। ऐसे में ये सिर्फ आयकर छूट का लाभ ही उठाते हैं। चुनाव प्रहरी ने सरकार से यह भी बदलाव चाहा है, बीस हजार के बजाए दो हजार के डोनेशन को दिखाने के लिए भी फॉर्म 24 ए में भी परिवर्तन होना ही चाहिए।

आधार से वोटर आईडी को जोड़ा जाए

दिसम्बर 2021 में राज्यसभा ने चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक-2021 को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया था। इस बिल में सबसे बड़ा बदलाव यही था कि आधार को वोटर आईडी से लिंक किया जाए। अब चुनाव आयोग कानून मंत्रालय से अनुरोध किया है, आधार को वोटर आईडी से जल्द से जल्द लिंक कराने की अधिसूचना जारी कर दे। चुनाव आयोग का एक और यह यह सुझाव भी एक दशक से लंबे समय से लंबित है। मौजूदा वक्त में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 14(बी) के अनुसार मतदाता सूची में पात्रता की योग्यता तिथि 01 जनवरी है। ऐसे में युवा 18 साल होने पर भी वोट से वंचित रह जाता है, क्योंकि नामावली अगले वर्ष संशोधित होती है।

यदि बीच में कोई चुनाव (Election Commission) आता है तो ये युवा वोटर अपने मताधिकार से वंचित रह जाते हैं। पूरी दुनिया में भारत की बात करें तो यहां सर्वाधिक युवा है। ऐसे में आयोग का सुझाव है, युवाओं को बतौर मतदाता रजिस्ट्रेशन करने को चार मौके मिलने चाहिए। आयोग ने पहले भी जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में पंजीयन कराने का सुझाव रखा था, लेकिन कानून मंत्रालय ने दो तिथियों का सुझाव दिया था- 01 जनवरी और 01 जुलाई। हालांकि अभी तक इसे भी अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।

(लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्च स्कॉलर हैं)

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