DEO Transfer Controversy: गरियाबंद में डीईओ पदस्थापना पर उठते गंभीर सवाल: वरिष्ठता नियमों की अनदेखी क्यों?

जीवन एस साहू / गरियाबंद/नवप्रदेश। छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग में जिला शिक्षा अधिकारियों की पदस्थापना (DEO Transfer Controversy) को लेकर एक बार फिर वरिष्ठता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में बलौदाबाजार-भाटापारा के प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश ने इस पूरे विषय को एक नई दिशा दे दी है। अब गरियाबंद जिले में जिला शिक्षा अधिकारी राजेश कुमार चंद्राकर की पदस्थापना को लेकर भी राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

प्राप्त विवरण के अनुसार, छत्तीसगढ़ शासन, स्कूल शिक्षा विभाग के 30 अप्रैल 2025 के आदेश के तहत व्याख्याता, व्याख्याता (एल.बी.) एवं प्रधान पाठक (माध्यमिक शाला) संवर्ग के अधिकारियों को प्राचार्य (उच्चतर माध्यमिक विद्यालय) पद पर पदोन्नत किया गया था। इस सूची में राजेश कुमार चंद्राकर का नाम क्रमांक 248 पर दर्ज है। इसके बाद 11 जून 2026 को जारी आदेश के माध्यम से उन्हें जिला शिक्षा अधिकारी, गरियाबंद के पद पर पदस्थ कर दिया गया। यहीं से मुख्य सवाल उठने लगे कि जब विभाग में अनेक ऐसे अधिकारी मौजूद थे जो प्राचार्य पद पर उनसे पहले पदोन्नत हुए अथवा वरिष्ठता क्रम में उनसे ऊपर थे, तब जिला शिक्षा अधिकारी जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद के लिए चयन का वास्तविक आधार क्या रहा?

न्यायालयीन आदेश और सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देश

DEO Transfer Controversy: मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब 17 जुलाई 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हरिशंकर जोशी बनाम राज्य शासन प्रकरण में स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि वरिष्ठ अधिकारी उपलब्ध हैं, तो शासन द्वारा जारी सामान्य प्रशासन विभाग (त्र्रष्ठ) के परिपत्रों की अनदेखी कर कनिष्ठ अधिकारी को उच्च पद का प्रभार देना बिल्कुल उचित नहीं है। न्यायालय द्वारा संबंधित आदेश को निरस्त कर शासन को वरिष्ठता और नियमों के अनुरूप नया निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं। यह न्यायालयीन आदेश पूरे शिक्षा विभाग की पदस्थापना प्रक्रिया पर बड़े प्रश्न खड़े कर रहा है।


सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा समय-समय पर जारी परिपत्रों (दिनांक 04.08.2011, 16.05.2012, 07.02.2013 एवं 14.07.2014) के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारी उपलब्ध होने पर कनिष्ठ को उच्च पद का प्रभार नहीं दिया जाना चाहिए। प्रशासनिक निर्णयों में वरिष्ठता और पात्रता का पूरा सम्मान होना चाहिए तथा अपवाद की स्थिति में इसके स्पष्ट कारण अभिलेखों में दर्ज किए जाने अनिवार्य हैं।

जवाब तलाशते प्रशासनिक और कानूनी सवाल

सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी परिपत्रों के आधार पर नियमित पदस्थापनाओं में भी समान पारदर्शिता की अपेक्षा की जाती है। शिक्षा जगत के जानकारों की मानें तो शिक्षा विभाग (DEO Transfer Controversy) अब तक यह स्पष्ट करने में नाकाम रहा है कि जिला शिक्षा अधिकारी पदस्थापना के लिए आखिरकार कौन-सी वरिष्ठता सूची अपनाई गई। क्या विभाग ने सभी पात्र प्राचार्यों का तुलनात्मक मूल्यांकन किया है? क्या किसी चयन समिति या स्क्रीनिंग प्रक्रिया का विधिवत पालन किया गया? यदि वरिष्ठ अधिकारियों को छोड़कर किसी अन्य कनिष्ठ अधिकारी को पदस्थ किया गया, तो उसके प्रशासनिक कारणों का उल्लेख कहाँ है? इस तरह के प्रश्नों के उत्तर सार्वजनिक होने चाहिए, जिससे प्रशासनिक कार्यों में अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।

व्यापक प्रभाव और सुधार की आवश्यकता

प्राप्त जानकारी के अनुसार गरियाबंद ही नहीं, बल्कि इस मामले में अन्य जिलों में भी विवाद की स्थिति बनी हुई है। बलौदाबाजार-भाटापारा का मामला पहले ही न्यायालय तक पहुंच चुका है। इससे पहले भी शिक्षा विभाग में संलग्नीकरण, स्थानांतरण, पदोन्नति, प्रभार तथा पदस्थापना को लेकर अनेक विवाद सामने आ चुके हैं। कई मामलों में कर्मचारियों और अधिकारियों को मजबूरन न्यायालय की शरण लेनी पड़ी है, जिससे विभागीय निर्णयों की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

शिक्षा जगत (DEO Transfer Controversy) के जानकारों का मानना है कि केवल पदोन्नति प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है। यदि किसी अधिकारी को जिला शिक्षा अधिकारी जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है, तो विभाग को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित अधिकारी वरिष्ठता, अनुभव, प्रशासनिक दक्षता तथा निर्धारित मापदंडों पर कैसे सबसे उपयुक्त पाए गए। यदि निर्धारित मापदंडों के आधार को विभाग सार्वजनिक नहीं करता, तो चयन प्रक्रिया पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है।

प्रशासनिक कार्यों के जानकारों का सुझाव है कि शासन को प्रत्येक जिला शिक्षा अधिकारी की पदस्थापना के साथ वरिष्ठता क्रम चयन का आधार, पात्र अधिकारियों की सूची तथा प्रशासनिक कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे अनावश्यक विवादों और न्यायालयीन मुकदमों में भारी कमी आएगी तथा विभाग की विश्वसनीयता में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

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