मांग से ज्यादा हो रहा उत्पादन, राज्य में बिजली की कमी नहीं : शुक्ला

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  • राज्य विद्युत कंपनी के चेयरमैन शैलेंद्र शुक्ला की नवप्रदेश से खास बातचीत
  • देशभर में उत्पादन की तुलना में आधी रह गई बिजली की मांग

ईश्वर चन्द्रा/ रायपुर। छत्तीसगढ़ (chhattisgarh state power company) राज्य विद्युत कंपनी के चेयरमैन शैलेन्द्र शुक्ला (chairman shailendra shukla) ने कहा कि प्रदेश में विद्युत संकट (no power shortage in state) जैसी कोई स्थिति नहीं है।

शुक्ला (chairman shailendra shukla) के मुताबिक, प्रदेश के साथ ही पूरे देश में बिजली की जितनी खपत है, उससे कहीं ज्यादा उत्पादन हो रहा है। जिससे छत्तीसगढ़ में भी विद्युत संकट (no power shortage in state) जैसी कोई स्थिति नहीं है।

बता दें कि शैलेन्द्र शुक्ला छत्तीसगढ़ (chhattisgarh state power company) राज्य विद्युत कंपनी के चेयरमैन पद पर आसीन हुए हैं तब से राज्य की विद्युत कंपनी घाटे से उबर कर मुनाफे की ओर बढ़ रही है।

बिजली बिल वसूली की स्थिति भी पहले से सुदृढ़ हुई है। साथ ही प्रदेश में पॉवर कट, लो वोल्टेज की समस्या को खत्म करने के लिए भी काफी प्रयास किए जा रहे हैं। कंपनी का लक्ष्य है छत्तीसगढ़ को जीरो पॉवर कट वाला राज्य बनाना। शैलेंद्र शुक्ला ने राज्य विद्युत कंपनी द्वारा किए जा रहे कार्यों के साथ ही विद्युत क्षेत्र से जुड़े तमाम पहलुओं पर नवप्रदेश संवाददाता ईश्वर चंद्रा से खुलकर बातचीत की।

करनी पड़ रही उत्पादन में कटौती

शुक्ला ने कहा कि देश में बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता की तुलना में मांग लगभग आधी है। केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 31 अक्टूबर 2019 की स्थिति में देश में बिजली उत्पादन की कुल स्थापित क्षमता 3,65 हजार मेगावॉट है। वहीं, इस वर्ष गर्मी के सीजन में 30 मई को बिजली की अधिकतम मांग 1,80 हजार मेगावॉट रही। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ समेत देश के ज्यादातर राज्यों और निजी बिजली उत्पादकों को उत्पादन में कटौती करनी पड़ी है।

आर्थिक सुस्ती का माहौल भी बड़ा कारण

बकौल शुक्ला आर्थिक सुस्ती के माहौल की वजह से देश में बिजली की औद्योगिक मांग नहीं बढ़ रही है। वहीं, घरेलू और सार्वजनिक समेत अन्य सेक्टरों में नए उपकरण और तकनीक के प्रयोग से खपत में भी कमी आई है।

2003 के अधिनियम से खुले कई संयंत्र

शुक्ला के अनुसार देश में 2003 में नया विद्युत अधिनियम लागू हुआ। इसके तहत विद्युत सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया। इसी अधिनियम के तहत सरकारी बिजली बोर्डों को भंग कर बिजली कंपनियां बनाई गई। विद्युत सेक्टर के जानकारों के अनुसार उस वक्त देश में बिजली की मांग की तुलना में आपूर्ति बेहद कम थी। ऐसे में उद्योगपतियों को इसमें बड़ा मुनाफा दिखा और ताबड़तोड़ संयंत्र स्थापित होने लगे।

ऊर्जा बचत के उपकरणों के कारण खपत में कमी

राज्य विद्युत कंपनी के चेयरमैन कहते हैं कि सामान्य घरों में ही पहले की अपेक्षा आज बिजली के उपकरणों की संख्या और उनके इस्तेमाल का समय बढ़ा है। लेकिन उच्च तकनी युक्त नए उपकरणों के इस्तेमाल में बिजली की खपत कम हो रही है। फ्रिज, एसी जैसे उपकरण जो पहले हर घंटे एक यूनिट बिजली जलाते थे, अब ऐसे उपकरण आ गए हैं, जिनमें दो दिन में एक यूनिट की खपत हो रही है। सोडियम और दूसरी लाइटों की तुलना में स्ट्रीट लाइट में एलईडी बल्ब के प्रयोग से करीब 16 हजार मेगावॉट बिजली की खपत कम हुई है। इसलिए खपत में कमी आई है, जिसका असर मांग पर दिखाई देता है।

ऐसे हाती है बिजली की सप्लाई

कुछ ही राज्य हैं जो अपनी जरूरत की बिजली का उत्पादन खुद करते हैं। राज्यों को केंद्रीय कोटे से भी बिजली मिलती है। राज्य और बड़े उद्योग (इनमें रेलवे भी शामिल हैं) अपनी मांग के हिसाब से निजी और सरकारी बिजली उत्पादकों से समझौता करते हैं। इसके हिसाब से उत्पादक उतनी बिजली ग्रिड (बिजली लाइनों) में सप्लाई करता है। जिस दर पर समझौता होता है, उसके हिसाब से भुगतान कर दिया जाता है। इस दौरान कोई संयंत्र बंद हो जाए या मांग अचानक बढ़ जाए तो ग्रिड से अतिरिक्त बिजली ली जाती है।

छत्तीसगढ़ में बढ़ी प्रति व्यक्ति औसत खपत

एक राष्ट्र एक ग्रिड के फॉर्मूले से कुछ घंटों की सूचना पर जितनी चाहे उतनी बिजली ली जा सकती है। एलईडी समेत अन्य एनर्जी एफिशिएंसी उपकरणों के प्रयोग से बिजली की खपत में कमी है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बात करें तो राज्य स्थापना के समय (१ नवंबर 2000) में यहां बिजली की प्रति व्यक्ति औसत खपत तीन सौ यूनिट थी जो अब (सितंबर 2019 तक स्थिति) में बढ़कर 1724 यूनिट हो गई है।

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