छत्तीसगढ़ में लंबे समय से चर्चा का विषय बना ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ अब आधिकारिक तौर पर कानून की शक्ल (Chhattisgarh Religious Freedom Act) ले चुका है। विधानसभा में 19 मार्च को पारित होने के बाद इस पर 6 अप्रैल को राज्यपाल रमेन डेका ने अपनी मुहर लगा दी थी, जिसके बाद अब इसे राज्य के राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया है।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा प्रस्तुत किए गए इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य राज्य में अवैध धर्मांतरण की गतिविधियों पर लगाम कसना और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को पारदर्शिता के साथ सुरक्षित करना है। सरकार का मानना है कि पुराने कानून वर्तमान चुनौतियों से निपटने में सक्षम नहीं थे, इसलिए समाज में समरसता बनाए रखने के लिए यह सख्त कदम उठाना अनिवार्य हो गया था।
सामाजिक तनाव को खत्म करने की कवायद (Chhattisgarh Religious Freedom Act)
इस कानून की आवश्यकता को लेकर उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि बस्तर और सरगुजा जैसे जनजातीय क्षेत्रों में धर्मांतरण से जुड़ी घटनाओं ने कई बार गंभीर सामाजिक तनाव और वर्ग संघर्ष की स्थितियां पैदा की हैं। बार-बार होने वाले इन विवादों के कारण न केवल कानून-व्यवस्था प्रभावित होती थी, बल्कि स्थानीय समुदायों के बीच आपसी भरोसा भी कम हो रहा था।
नया कानून इन स्थितियों को रोकने के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है, जिसमें ग्राम सभाओं को भी शक्ति दी गई है। अब किसी भी धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए आवेदन और जांच की एक अनिवार्य समय-सीमा तय की गई है, ताकि कोई भी व्यक्ति किसी भय या गुप्त एजेंडे के तहत धर्म न बदल सके।
धर्म परिवर्तन की नई और अनिवार्य प्रक्रिया
अब राज्य में धर्म परिवर्तन करना कोई गोपनीय प्रक्रिया नहीं रह जाएगी। नए नियमों के अनुसार, धर्मांतरण के इच्छुक व्यक्ति को सबसे पहले प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष अपनी इच्छा जाहिर करते हुए आवेदन देना होगा। इसके बाद एक सार्वजनिक सूचना जारी कर आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी और पूरी जांच के बाद ही जिला प्रशासन द्वारा प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा।
इसके साथ ही, धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के लिए अब वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना और अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य (Chhattisgarh Religious Freedom Act) होगा। कानून में यह भी साफ किया गया है कि विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना जा सकता और शादी के बाद भी धर्म बदलने के लिए इसी लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
दोषियों के लिए जेल और भारी जुर्माने की व्यवस्था
अवैध धर्मांतरण के मामलों में दोषियों को हतोत्साहित करने के लिए इस कानून में बेहद कड़े दंड रखे गए हैं। सामान्य अवैध धर्मांतरण के मामलों में 7 से 10 वर्ष तक के कारावास और 5 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है। यदि पीड़ित महिला, नाबालिग या अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से है, तो सजा 10 से 20 वर्ष तक की जेल और 10 लाख रुपये जुर्माने तक जा सकती है।
सामूहिक धर्मांतरण जैसे गंभीर अपराधों के लिए 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये के जुर्माने की व्यवस्था (Chhattisgarh Religious Freedom Act) की गई है। इसके अलावा, यदि कोई लोक सेवक इस अपराध में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके लिए भी 20 वर्ष तक की जेल और भारी आर्थिक दंड का प्रावधान है।
पीड़ितों को मुआवजा और जांच का कड़ा तंत्र
कानून में केवल सजा ही नहीं, बल्कि पीड़ितों के न्याय के लिए ‘प्रतिकार व्यवस्था’ भी जोड़ी गई है। यदि किसी का धर्मांतरण दबाव या धोखे से हुआ है, तो न्यायालय आरोपी को आदेश दे सकता है कि वह पीड़ित को आर्थिक क्षतिपूर्ति दे।
इन संवेदनशील मामलों की जांच उप-निरीक्षक या उससे वरिष्ठ स्तर के अधिकारियों द्वारा की जाएगी और खुद को निर्दोष साबित करने की पूरी जिम्मेदारी आरोपी पक्ष (Chhattisgarh Religious Freedom Act) पर होगी। सरकार का इरादा इस कानून के जरिए यह संदेश देना है कि धर्म चुनने की आजादी तो बरकरार रहेगी, लेकिन प्रलोभन और जबरदस्ती के खेल के लिए अब छत्तीसगढ़ में कोई जगह नहीं होगी।
