छत्तीसगढ़शहर

सात पीढिय़ों से जीवंत बस्तर की अनूठी परंपरा: बंधा मतौर उत्सव

बरकई में आस्था, कौतूहल और सामाजिक समरसता का महासंगम
सन्नी ठाकुर

फरसगांव/कोंडागांव/नवप्रदेश। आधुनिकता के इस दौर में भी छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल अपनी सदियों पुरानी और हैरतअंगेज लोक-परंपराओं को समेटे हुए है। इसका एक जीवंत और चमत्कारी नजारा कोंडागांव जिले के माकड़ी ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत बरकई में देखने को मिला, जहाँ सात पीढिय़ों से चली आ रही ऐतिहासिक ‘बंधा मतौरÓ उत्सव का आयोजन बड़े ही हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। हर तीन साल में एक बार होने वाले इस पारंपरिक महापर्व में इस बार आस-पास के 12 पाली के हजारों ग्रामीणों का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा।

इस उत्सव की सबसे विस्मयकारी विशेषता यह है कि जैसे ही तालाब के किनारे मोहरी (पारंपरिक वाद्य यंत्र) पर विशेष ‘सती पाढ़ धुन गूंजती है, तालाब की हजारों मछलियां खुद-ब-खुद पानी की सतह पर आकर उछलने लगती हैं। इतना ही नहीं, सामूहिक मत्स्याखेट के बाद मालगुजार के पानी को छूते ही बची हुई मछलियां पल भर में गायब हो जाती हैं। बस्तर की यह अनूठी परंपरा न केवल लोगों के कौतूहल का केंद्र है, बल्कि यह जल संरक्षण, नई फसल की खुशहाली और सामाजिक समरसता का एक अद्भुत संदेश भी देती है।

‘सती पाढ़ धुन का रहस्य और चमत्कार
विशेष पारंपरिक धुन: ग्राम पुजारी द्वारा देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के बाद मालगुजार को बाजा-मोहरी के साथ तालाब (बंधा) तक लाया जाता है। मछलियों का उछलना: जैसे ही मोहरी पर एक विशेष पारंपरिक धुन ‘सती पाढ़Ó बजाई जाती है, तालाब की हजारों मछलियां खुद-ब-खुद पानी की सतह पर आकर उछलने लगती हैं।
मां सती का आशीर्वाद: लोक-विश्वास के अनुसार, यह कोई साधारण मत्स्य आखेट नहीं बल्कि साक्षात मां सती का आशीर्वाद है।

मालगुजार का अनुभव और लोक-विश्वास

पीढिय़ों पुरानी शक्ति: मालगुजार देशमन पांडे के अनुसार, पूर्वजों के समय इसमें तंत्र-मंत्र का विधान भी शामिल था। स्वरूप भले बदला हो, लेकिन देवी-देवताओं की शक्ति आज भी अटूट है।
स्पर्श मात्र से गायब होना: इस उत्सव का सबसे विस्मयकारी पहलू यह है कि सामूहिक आखेट के बाद जैसे ही मालगुजार द्वारा दोबारा पानी को स्पर्श किया जाता है, बची हुई तमाम मछलियां पल भर में शांत और ओझल (गायब) हो जाती हैं।

सामूहिक मत्स्याखेट का महाअभियान

हजारों ग्रामीणों की भागीदारी: मालगुजार से आदेश मिलते ही हजारों की संख्या में ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ तालाब में उतरते हैं।
सीमित समय: यह सामूहिक रूप से मछली पकडऩे का महाअभियान करीब 1 से 2 घंटे तक चलता है।

जल संरक्षण और सामाजिक समरसता का संदेश
प्रकृति के प्रति आभार: यह उत्सव जल स्रोतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, नई फसल की खुशहाली और गांव को विपत्तियों से बचाने के लिए मनाया जाता है।

    सामूहिक भोज (गोठ): इस अवसर पर विशेष सामूहिक भोज और लोक नृत्यों का आयोजन किया जाता है, जो आपसी भाईचारे और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है।

    कड़े सुरक्षा इंतजाम

      सुरक्षा के कड़े नियम: भारी भीड़ को देखते हुए तालाब समिति व ग्रामीणों ने बच्चों और बुजुर्गों के पानी में उतरने पर रोक लगाई थी।
      पुलिस बल की तैनाती: आयोजन को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए विशेष पुलिस बल और गाड्र्स की तैनाती की गई थी।

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