हरियाली की अनोखी मुहिम: हम गुजरे कल में रहते हैं, यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं

हरिओम चौहान
दुर्ग/नव प्रदेश। दुर्ग जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी के सुरम्य तट पर स्थित है एक छोटा सा गांव पीसेगांव। जो पर्यावरण प्रेमियों के लिए प्रेरणा का प्रकाश पुंज है। यह पूरा गांव पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। यहां एक भी ऐसा घर या परिवार नहीं है, जिसने अपने दिवंगत परिजनों के नाम पर वृक्षारोपण न किया हो। ये न सिर्फ अपने परिजनों की स्मृति में पौधा लगाते हैं बल्कि आजीवन उनसे जीवंत रिश्ता निभाते। यहां स्थित नवग्रह वाटिका और जन्म शताब्दी वन में गांव के लोग पिछले दो दशकों के दौरान चार हजार से भी अधिक पौधे लगा चुके हैं।
प्रतिदिन पेड़ों की करते हैं पूजा: इस गांव की परंपरा रही है कि दिवंगत परिजनों की स्मृति में लगाए गए पौधों के साथ जीवंत रिश्ता बनाए रखना होता है। यहां लगे वृक्षों में कोई किसी का पिता है, कोई किसी का पति है तो कोई किसी का भाई या बहन है। जिनसे मिलने वे रोज आते हैं। उनकी पूजा करते हैं। परिजन की तरह ही देखभाल करते हैं और उनके पास बैठकर बतियाते हैं। उन्हें अपना दुख दर्द बताते हैं। ऐसा करके उन्हें आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।
मधु देशमुख नामक महिला ने बताया कि उसने अपनी मां स्व. लक्ष्मी देशमुख की स्मृति में जो पेड़ लगाया उसे वे अपनी मां की तरह ही मानती हैं और उनके साथ बहुत वक्त बिताती हैं। ऐसा करना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। यामिनी साहू ने बताया कि उनके द्वारा रोपा गया पौधा पेड़ बन गया है जिससे मिलने वे रोज आती है। इसी तरह कुमारी बाई देशमुख अपने पति स्व. कन्हैया लाल देशमुख की स्मृति में लगाए गए पेड़ की अपने पति के रुप में रोज पूजा करती हैं। उनके साथ घंटों बैठकर बात करती हैं।
गायत्री परिवार से मिली प्रेरणा
पर्यावरण संरक्षण के लिए संकल्पित गायत्री परिवार से जुड़े रमाकांत देशमुख ने दैनिक नव प्रदेश को बताया कि गायत्री परिवार की प्रेरणा से हम लोगो ने अपने गांव में वृहद वृक्षारोपण का संकल्प लिया था। नवयुवक मंडल तथा महिला मंडल और गांव के सभी लोग मिलकर अब इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके लिए गांव के हर घर से प्रतिदिन एक मुठ्ठी अनाज एकत्रित किया जाता है और अन्न को बेचकर जो धन मिलता है उससे वृक्षारोपण अभियान को गति दी जाती है और पर्यावरण संरक्षण के लिए अन्य कार्य भी किए जाते हैं।
उनका कहना है कि प्रकृति हमें जो निशुल्क सौगात देती है उसका ऋण चुकाना हमारा परम पुनीत कर्तव्य है। सभी को अधिक से अधिक वृक्षारोपण के लिए आगे आना चाहिए और इस पुण्य कार्य में अपना हाथ बंटा ना चाहिए। सभी के समवेत प्रयास से ही पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने बताया कि पीसेगांव के लोग पर्यावरण के प्रति बेहद जागरूक हैं और सभी वृक्षारोपण के काम में हर संभव सहयोग के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। साथ ही आसपास के गांव के लोगों को भी वृक्षारोपण के लिए प्रेरित करते हैं।
गेंदलाल देशमुख का सम्मान हो
रमाकांत देशमुख ने बताया कि उनके गांव में तो एक पूरा समूह वृक्षारोपण अभियान से जुड़ा है लेकिन ग्राम भान पुरी निवासी स्व. गेंदलाल देशमुख तो वन मेन आर्मी थे। जिनका उन्हें मार्गदर्शन समय समय पर मिलता था। स्व. गेंदलाल देशमुख ने अकेले अपने दम पर अपने गांव में जंगल ऊगा लिया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन वृक्षारोपण के लिए समर्पित कर दिया था। अपने गांव भानपुरी से लेकर महाराजा चौक बोरसी दुर्ग तक लगभग सात किलोमीटर तक उन्होंने सड़क के दोनों किनारे वृक्षारोपण कर नया इतिहास रचा दिया था। किंतु उनके इस अमूल्य योगदान के लिए उन्हें जीते जी सरकार से कोई सम्मान नही मिला। अब मरणोपरांत उन्हें सम्मानित करने पर राज्य सरकार को विचार करना चाहिए ताकि पर्यावरण के क्षेत्र में निस्वार्थ सेवा करने वालों का उत्सव बढ़े।
अंत्येष्टि के बांस का सदुपयोग
पीसेगांव में वृक्षारोपण के सपथ ही उसके संरक्षण के लिए एक अभिनय पहल यह की गई है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद अंत्येष्टि के दौरान काठी के बांस को जलाया नही जाता उसे वापस लाकर उसका उपयोग ट्री गार्ड के रूप में किया जाता है। इसी तरह मृतक को ओढ़ाई जाने वाली पिताम्बरी का उपयोग पौधों को कड़ी धूप से बचाने के लिए किया जाता है।
यादों के जुगनुओं का जंगल
पीसेगांव के लोगों ने अपने गांव में दिवंगत परिजनों की याद में जुगनुओं का जंगल ऊगा रख है। जिसे देखकर बरबस ही यह प्यारा गीत जुबान पर आ जाता है कि- आने वाला कल एक सपना है गुजरा हुआ कल बस अपना है, हम गुजरे कल में रहते हैं, यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं…। वाकई यह गांव यहां के बाशिंदों के दिवंगत परिजनों की यादों का रमणीय जंगल बनता जा रहा है। पेड़ पौधों से उनका जीवंत और अटूट रिश्ता न सिर्फ छत्तीसगढ़ प्रदेश बल्कि पूरे देश के पर्यावरण प्रेमियों के लिए अनुकरणीय है।
अब यहां के लोग अपने जन्मदिन, शादी की सालगिरह और गृह प्रवेश जैसे शुभ अवसरों पर भी पौधारोपण करते हैं। जिसमें दो साल के बच्चे से लेकर अस्सी साल के बुजुर्ग तक सभी इस पुण्य कार्य में अपनी सहभागिता दर्ज कराते हैं। हैरत होती है कि आज के आपाधापी के समय में भी पीसेगांव के लोग पेड़ पौधों की सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिए इतना वक्त निकाल पाते हैं। निश्चित रुप से उनका यह सद् प्रयास अतुलनीय, अविस्मरणीय और अनुकरणीय है।



