संपादकीय

संपादकीय: मजदूर आज भी मजबूर क्यों

Editorial: १ मई 1886 को अमेरिका में एक बड़ा श्रमिक आंदोलन हुआ था। उस समय पहली बार वहां के मजदूरों ने अपने हक की लड़ाई को लेकर संघर्ष का संखनाद किया था। उसी की स्मृति में पूरी दुनिया में एक मई को मजदूर दिवस मनाया जाता है और प्रमुख रूप से यह नारा लगाया जाता है कि दुनिया के मजूदर एक हों। मजदूर लगातार संघर्ष कर रहा है लेकिन आज भी उसकी दुनिया के कई देशों में दूरदशा है। बेशक मजदूर देश और समाज की रीढ़ होता है और अपने पसीने से विकास की बगिया को सिंचता है उसके पसीने की हर बूंद में राष्ट्र निर्माण की सुगंध रहती है।

इसके बावजूद आज भी दुनिया में यदि सबसे ज्यादा शोषित, पीडि़त, उपेक्षित और प्रतािड़त यदि कोई है तो वह निरी मजदूर ही है। मजदूरों की इस दयनीय दशा पर सटीक बैठती है यह पंक्तिंया – जिंदगी अब इस कदर शफ्फाक हो जाएगी क्या भूख ही मजदूर की खुराक हो जाएगी क्या। जहां तक बात भारत की है तो यहां दुनिया के अन्य देशों के मुकाबलें मजदूरों की स्थिति बद से बद्तर हो गई है। मजदूरो की दैयनीय दशा देश ने कोरोना काज में देखी थी जब देश के बड़े बड़े महानगरों की जुग्गी झोपड़ी में नारकी जीवन जीने वाले करोड़ो मजदूरों को अपने गांव लौटना पड़ा था। उस समय लाखों की संख्या में ये मजदूर अपने परिवार के साथ ग्रहस्थि का समान अपने कंधों और सिर पर लादकर सैंकड़ो किलो मीटर पैदल चलकर अपने गांव पहुंचे थे।

यह है हमारे देश में मजदूरों की स्थिति। हालांकि सरकार ने श्रमिकों के कल्याण के लिए कई योजनाएं बना रखी है लेकिन धरातल पर उनका क्रियान्वयन नहीं हो पाता। यही स्थिति श्रम कानूनों की है जिसका नियोक्ता खुला उल्लंघन करते हैं और श्रमिकों का भरपूर शोषण करते हैं। मजबूर मजदूर अपने खिलाफ होने वाले अन्याय को अपनी नियती मानकर सबकुछ चुपचान सहने के लिए बाध्य हंै। मजदूरों की हितों की रक्षा करने के लिए तथा उनके अधिकारों को आवाज देने के लिए विभिन्न श्रमिक संगठन भी है लेकिन इनमें से कुछ ही श्रमिक संगठन है जो सही मायनों में श्रमिकों के हितों की रक्षा करते हैं और उनके लिए लड़ाई लड़ते हैं। अधिकांश श्रमिक संगठन मजदूरों से ज्यादा मालिकों की चिंता करते हैं। यही वजह है कि आज भी हमारे देश में मजदूरों को जीवन स्तर ऊपर नहीं उठ पा रहा है वे खुद अपना खुन पसीना बहाकर नगरों और महानगरों में विशाल भवनों का निर्माण करते हैं लेकिन वे सारी जिंदगी मजदूरी करने के बाद भी अपना एक छोटा सा अशियाना नहीं बना पाते।

शहरों में स्थित झुग्गी बस्तियों में किराये में रहकर वे अपना पूरा जीवन निकाल बीता देते हैं। जहां उन्हें न ही स्वच्छ जल मिल पाता है न ही स्वच्छ वातावरण मिलता है। इस पर भी सटीक बैठता है यह शेर शहर में मजदूर जैसा दर-ब-दर कोई नहीं जिसने सबके घर बनाए उसका घर कोई नहीं। भारतीय मजदूर चाहे वे कल कारखानों में काम करते हों अथवा निर्माण कार्यों से जुड़े हों या खेतीहर श्रमिक हों या फिर मनरेगा योजना के तहत साल में सौ दिन काम करने वाले मजदूर हों। कमोवेश सभी की स्थिति बेहद दैयनीय है। सरकर हर साल एक मई मजदूर दिवस पर बड़ी बड़ी घोषणाएं करती है। कहीं कहीं कुछ श्रमिकों का सम्मान भी करती है और इसी के साथ अपने कत्वर्य की इतिश्री कर लेती है।

जब मजदूरों के हित में कारगर कदम उठाने की आती है तो सरकार चुप्पी साध लेती है। मजदूरों को उनके भाग्य के भरोसे ही छोड़ दिया जाता है। सबसे अधिक प्रताडि़त तो असंगठित मजदूर होते हैं उनके साथ ही सबसे ज्यादा भेदभाव किया जाता है क्योंकि उनके हितों की रक्षा के लिए कोई सामने नहीं आता। ऐसे असंगठित श्रमिकों की संख्या ही देश में सबसे ज्यादा है जिनका नियोक्ता और ठेकेदार भारी शोषण् करते हैं।

इन्हें शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती और आठ घंटे जगह दस से बारह घ्ंाटे तक काम लिया जाता है। न तो इन्हें साप्ताहिक अवकाश मिलता है और न ही किसी तरह की चिकित्सा सुविधा दी जाती है। ऐसे असंगठित मजदूरों की सुध लेने की सबसे ज्यादा जरूरत है और इस बारे में सरकार को गंभीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है साथ ही असंगठित श्रमिकों के लिए भी श्रम कानून का कठोरतापूर्वक पालन कराने की जरूरत है तभी मजदूर दिवस की सार्थकता सिद्ध हो पाएगी।

Related Articles

Back to top button