NIOT Andaman Nicobar : समुद्र आधारित आजीविका को नया आयाम: अंडमान-निकोबार में NIOT की बहुआयामी पहल से खुल रहे नए अवसर

भूमि संसाधनों की सीमाओं, बढ़ती आबादी और पारंपरिक आजीविका पर बढ़ते दबाव के बीच समुद्र आधारित विकास को सशक्त बनाने की दिशा में राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी – एनआईओटी) की पहलें अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में नई संभावनाओं के द्वार खोल (NIOT Andaman Nicobar) रही हैं। खुले समुद्र में केज कल्चर, कृत्रिम रीफ स्थापना, समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती तथा गहरे समुद्र मिशन जैसी उन्नत समुद्री प्रौद्योगिकियों के माध्यम से तटीय क्षेत्रों में आजीविका, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है।
एनआईओटी द्वारा संचालित ओपन सी केज कल्चर (खुले समुद्र में पिंजरा आधारित मछली पालन) कार्यक्रम एक समाजोन्मुखी पहल के रूप में उभर कर सामने आया है, जिसका उद्देश्य तटीय और द्वीपीय समुदायों को टिकाऊ एवं वैकल्पिक आजीविका प्रदान करना है। भूमि आधारित मत्स्य पालन की अपनी सीमाएँ हैं, जहाँ न तो असीमित विस्तार संभव है और न ही जल संसाधनों का अनियंत्रित उपयोग। इसके विपरीत समुद्र एक विशाल प्राकृतिक संसाधन है, जहाँ प्राकृतिक जल परिसंचरण के कारण जल परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती और वैज्ञानिक तरीके से आहार प्रबंधन द्वारा मछलियों की स्वस्थ वृद्धि संभव होती है
एनआईओटी ने इस दिशा में उन्नत मूरिंग प्रौद्योगिकी विकसित की है, जो चक्रवात और प्रतिकूल मौसम की परिस्थितियों में भी केज संरचनाओं को सुरक्षित बनाए रखने में सक्षम है। पूर्व में आए चक्रवातों के दौरान इन केजों की संरचनात्मक मजबूती और उनमें पाली जा रही मछलियों की सुरक्षा ने इस तकनीक की विश्वसनीयता (NIOT Andaman Nicobar) को सिद्ध किया है। अंडमान-निकोबार में यह कार्यक्रम स्थानीय मत्स्य विभाग के सहयोग से संचालित किया जा रहा है, ताकि मछुआरों को प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
समुद्री मत्स्य संसाधनों में आ रही गिरावट के समाधान के रूप में कृत्रिम रीफ (आर्टिफिशियल रीफ) एक प्रभावी और दीर्घकालिक उपाय के रूप में सामने आया है। पारंपरिक मछुआरे छोटी नौकाओं के माध्यम से गहरे समुद्र में नहीं जा पाते, जिससे तटीय क्षेत्रों में मछली की उपलब्धता घटने पर उनकी आय सीधे प्रभावित होती है। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय मछुआरों और मत्स्य विभाग के अनुरोध पर एनआईओटी द्वारा वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है, जिसमें समुद्री धाराओं, ज्वार-भाटा, तरंगों तथा समुद्र तल की प्रकृति का विस्तृत विश्लेषण शामिल होता है।
जहाँ समुद्र तल रेतीला और जैविक गतिविधियों से लगभग रहित पाया जाता है – जिसे ‘समुद्री मरुस्थल’ कहा जा सकता है – वहीं कृत्रिम रीफ स्थापित किए जाते हैं। जीवित प्रवाल (कोरल) क्षेत्रों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाता। स्थानीय मछुआरों के अनुभव के आधार पर रीफ का डिज़ाइन तय किया जाता है – कहीं लॉब्स्टर मत्स्य पालन को ध्यान में रखते हुए, तो कहीं सामान्य मछलियों के लिए। त्रिकोण, चौकोर और गुंबदनुमा संरचनाएँ समुद्र में स्थापित की जाती हैं, जो समय के साथ एक ‘अंडरवॉटर फ़ॉरेस्ट’ का रूप ले लेती हैं। इन क्षेत्रों में एक वर्ष के भीतर ही मछलियों की वापसी और मत्स्य संसाधनों में वृद्धि दर्ज की गई है।
एनआईओटी का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि किसी भी समुद्री हस्तक्षेप में स्थानीय मछुआरों की भागीदारी और राय सर्वोपरि है। मछुआरे स्वयं उन क्षेत्रों की पहचान करते हैं जहाँ मत्स्य उत्पादन में गिरावट (NIOT Andaman Nicobar) आई है। इन्हीं प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर अध्ययन, योजना और क्रियान्वयन किया जाता है। कृत्रिम रीफ की ऊँचाई भी इस प्रकार निर्धारित की जाती है कि छोटी डोंगियों और पारंपरिक नौकाओं को किसी प्रकार की बाधा न हो। ओडिशा, तमिलनाडु सहित कई राज्यों में मछुआरों द्वारा स्वयं की गई पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
समुद्री शैवाल (सीवीड) खेती के क्षेत्र में भी एनआईओटी द्वारा उल्लेखनीय कार्य किया जा रहा है। आमतौर पर ‘समुद्री खरपतवार’ समझे जाने वाले सीवीड के खाद्य, औषधीय और औद्योगिक उपयोग अत्यंत व्यापक हैं। फिलीपींस और थाईलैंड जैसे देशों में यह भोजन का अहम हिस्सा है। अंडमान-निकोबार में एनआईओटी ने मत्स्य विभाग के सहयोग से 96 लोगों को सीवीड खेती का प्रशिक्षण प्रदान किया है। भविष्य में दुग्ध संग्रह केंद्रों की तर्ज़ पर सीवीड संग्रह केंद्र विकसित कर इसे संगठित आजीविका का स्वरूप देने की योजना है।
अंडमान-निकोबार में मत्स्य और सीवीड उत्पादन की अपार संभावनाएँ हैं, किंतु सीधी अंतरराष्ट्रीय हवाई कनेक्टिविटी के अभाव में निर्यात लागत बढ़ जाती है, जिससे मछुआरों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। विशेषज्ञों के अनुसार बेहतर संपर्क सुविधाएँ उपलब्ध होने पर द्वीपों से समुद्री उत्पादों का सीधा निर्यात संभव हो सकेगा।
एनआईओटी भारत सरकार के महत्वाकांक्षी डीप ओशन मिशन के अंतर्गत ‘समुद्रयान’ परियोजना पर भी कार्य कर रहा है। यह तीन सदस्यीय मानवयुक्त पनडुब्बी होगी, जो 6,000 मीटर की गहराई तक जाकर समुद्री पर्यावरण, जैव विविधता और संसाधनों का अध्ययन करेगी। अत्यधिक दबाव सहने वाली इस गोलाकार संरचना के परीक्षण वर्ष 2027 के आसपास प्रस्तावित हैं।
इसके साथ ही, अंडमान-निकोबार सहित पूरे भारतीय तट पर समुद्री जल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम पिछले 25 वर्षों से संचालित (NIOT Andaman Nicobar) है। यह कार्यक्रम पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र (नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च – एनसीसीआर) द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में चलाया जा रहा है, जिसमें एनआईओटी भी सक्रिय भागीदार है।
इस दीर्घकालिक डेटा से पर्यावरणीय आकलन और भविष्य की समुद्री योजनाओं को वैज्ञानिक आधार मिलता है।
समग्र रूप से, अंडमान-निकोबार में समुद्री संसाधनों का संतुलित, सुरक्षित और वैज्ञानिक उपयोग करते हुए मारिकल्चर, मत्स्य पालन और अनुसंधान को आगे बढ़ाने की दिशा में एनआईओटी की पहलें न केवल स्थानीय आजीविका को सुदृढ़ कर रही हैं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और समुद्री आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी मजबूती प्रदान कर रही हैं।



