संपादकीय

संपादकीय: पीडीए की नई परिभाषा

The New Definition of PDA: उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में अब कुछ माह ही शेष रह गये हैं। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमों अखिलेश यादव जहां संसद में चंदा चोरी के मुद्दे को लेकर भाजपा पर निशाना साध रहे हैं और इसे लेकर संसद के बाहर लगातार समाजवादी पार्टी के सांसद प्रदर्शन कर रहे हैं जिसे अब कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन में शामिल अन्य दलों का भी समर्थन मिल रहा है यहां तक की नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जो जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज के मुद्दे को लेकर आक्रामक रूख अपनाये हुए थे वे भी समाजवादी पार्टी के सूर में सूर मिलाते हुए संसद के बाहर चंदा चोर गद्दी छोड़ का नारा लगा रहे हैं।

इसी प्रदर्शन के दौरान निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने साधू के वेश में चंदा चोरी का नाटक करके साधु संतो की नाराजगी मोल ले ली थी। जिन्होंने पप्पू यादव के साथ ही समाजवादी पार्टी पर भी जमकर निशाना साधा था। जब यह बात अखिलेश यादव के समझ में आई तो उन्होंने डैमेज कंट्रोल के लिए ब्राम्हण जाति को साधने के लिए अपने पीडीए की परिभाषा फिर एक बार बदल ली पहले वे पीडीए का अर्थ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक बताते थे बाद में उन्होंने ए का मतलब अल्पसंख्यक की जगह अगड़ा बताना शुरू कर दिया था और अब उन्होंने पीडीए में पी का मतलब पंडित बताया है।

उन्होंने योगी सरकार पर ब्राम्हण समाज के साथ अन्याय करने का भी आरोप लगाया है और दावा किया है कि पीडीए ही ब्राम्हणों के हितों की रक्षा करेगा। दरअसल अखिलेश यादव अपना जनाधार उत्तरप्रदेश में कमजोर पड़ता जा रहा है। वहां का पिछड़ा वर्ग भाजपा के साथ रहा है सिर्फ यादव समाज ही समाजवादी पार्टी का समर्थक है लेकिन इसमें भी भाजपा सेंध लगा रही है। दलित वोट बैंक भी समाजवादी पार्टी से छिटकने का खतरा पैदा हो गया है। क्योंकि बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमों मायावती इस बार उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव पुरी ताकत से लडऩे जा रही हैं। यह चुनाव मायावती के लिए करो या मरो वाला है।

मायावती जानती है कि यदि इस बार भ उनकी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा तो उनकी राजनीति ही खत्म हो जाएगी। आज भी उनके साथ दलित समाज का एक बड़ा वर्ग जुड़ा हुआ है। जाहिर है मायावती समाजवादी पार्टी का खेल बिगाड़ेंगी वे न सिर्फ दलित वोट को बल्कि मुस्लिम वोट को भी समाजवादी पार्टी के पाले से अपनी ओर खींच सकती हैं। समाजवादी पार्टी के परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक में भी इस बार अस्सद्दुदीन ओवैसी सेंध लगाने जा रहे हैं। उन्होंने पहले समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने की अपील की थी लेकिन कांग्रेस के विरोध के कारण अखिलेश यादव ओवैसी के साथ हाथ मिलाने में हिचक रहे हैं।

अलग होकर चुनाव लड़ते हैं तो निश्चित रूप से वे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नुकसान पहुंचाएंगे। भले ही वे पिछले विधानसभा चुनाव की तरह एक भी सीट न जीत पाये लेकिन कई सीटों पर चुनावी गण्ति को गड़बड़ा देंगे। यही वजह है कि अब अखिलेश यादव ने पीडीए की नई परिभाषा गढ़ी है। और पी का मंतलब पंडित बताकर ब्राम्हणों सहित अन्य अगड़ी जातियों को अपने पालें में लाने की कवायद कर रहे हैं। बिहार विधानसभा की बाकींपुर सीट पर हुए उपचुनाव में इस तरह से जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर ने अगड़ा बाहुल पीठ पर भाजपा को पराजित किया है। उससे भी अखिलेश यादव उत्साहित हो गये हैं। उन्हें लग रहा है कि अब अगड़ा वर्ग आरक्षण के मुद्दे को लेकर भाजपा से नाराज हो गया है। ऐसे में स्वर्ण वोटों को साधने का उन्हें अनुकूल अवसर नजर आ रहा है। इसमें उन्हें इतनी सफलता मिलती है यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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