अपनी विश्वसनीयता बचाए रखें

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कनक तिवारी
9425220737
क्रमांक-9

न्यायपालिका के लिए सुखद संकेत है कि राजनीतिज्ञों, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, डॉक्टरों, वकीलों, तथा इंजीनियरों के मुकाबले उनकी बेहतर विश्वसनीयता समाज में कायम है। आम धारणा है कि न्यायाधीश उचित फैसला करते हैं। भले ही बहुतेरे फैसले न्यायपूर्ण नहीं होते। कई ऐसे न्यायाधीश ‘ख्यातनाम’ भी हुए हैं जिनकी वजह से न्यायपालिका का अवमूल्यन हुआ है। तमाम उपलब्धियों के बावजूद न्यायमहल की बुनियाद अब पूरी तरह चट्टानी नहीं रह गई है। चूलें हिलने लगी हैं। जगह जगह पलस्तर उखड़ रहा है। ऐसी पुस्तकें खुद शीर्ष न्यायाधीशों ने लिखी हैं जिनमें न्यायपालिका की खुली आलोचना की गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस मुखर्जी सहित पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, लखनऊ, कोलकाता, राजस्थान आदि उच्च न्यायालयों से उमड़ते सवाल राष्ट्रीय चिंता का कंटूर उकेरते हैं। बेबाक पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस.पी. भरुचा ने न्यायाधीशों के सम्मेलन में ही कटाक्ष किया था कि उच्च न्यायालयों में हर पांचवा न्यायाधीश भ्रष्टाचार से युक्त है। भरुचा का कथन सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त शिकायतों के तथ्यात्मक अन्वेशण की रिपोर्ट पर आधारित था। उसका खंडन करने की हिम्मत देश में किसी को नहीं हुई। इस समय सुप्रीम कोर्ट में हजारों, उच्च न्यायालय में लाखों तथा कनिष्ठ न्यायपालिका में करोड़ों मुकदमे हैं। सुप्रीम कोर्ट हर वर्ष लगभग उतने मुकदमे निपटा देता है जितने उसे मिलते हैं। उच्च न्यायालय तिहाई मामले ही निपटा पाते हैं और अधीनस्थ न्यायालय भी लगभग उतने ही। ऊंची अदालतों के न्यायाधीशों के दुव्र्यवहार, दुराचरण और अयोग्यता को लेकर प्रथम दृष्टि में विश्वसनीय लगता कोई आरोप लगाया जाता है। तब ऐसे न्यायाधीश के विरुद्ध संसद में महाभियोग प्रस्तुत किए जाने का संविधान में प्रावधान है। हमारे भोले और निष्कपट संविधान निर्माताओं ने यह नहीं देखा था कि आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सफेदपोशी की आड़ में बहुत सी काली भेड़ें भी न्यायिक हुकूमत करने घुस सकती हैं। उन्हें खदेडऩे के लिए महाभियोग जैसे तोपनुमा हथियार के बदले जनता के सामान्य हाथों में तमंचानुमा जांच प्रक्रिया की ज़रूरत होगी। इस देश में मतदाताओं के अजीबोगरीब रुझान के कारण सरकारें तक स्पष्ट बहुमत के लिए गठबंधन में जकड़ती चली जा रही हैं। किसी न्यायाधीश को महाभियोग के जरिए हटाने के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत कैसे मिल पायेगा? संसद तो युद्ध, विदेशी आक्रमण, जन अशांंति और महामारियां फैलने की असामान्य स्थितियों में भी दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए जनमत की भीख मांगती है। किसी जज को बर्खास्त करने के लिए दो तिहाई बहुमत का जुगाड़ कर पाना संवैधानिक और व्यावहारिक तौर पर कैसे संभव होगा? कठिनाई यह भी है कि यदि न्यायाधीश का आचरण इस नस्ल का हो कि संसद में महाभियोग का प्रस्ताव पास भले नहीं हो, लेकिन पद पर बने रहना मुनासिब नहीं हो, तब क्या किया जाये। यदि किसी संदिग्ध न्यायाधीश के विरुद्ध दुराचरण सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध हों, तो उसे अधिवक्ता संघों के बहुमत या प्रेस को भत्र्सना के लिए सौंपा भी तो नहीं जा सकता। सिविल समाज भी संविधान और न्यायपालिका को इंजीनियरिंग या चिकित्सा की तरह तकनीकी विषय समझकर उसे केवल विशेषज्ञों अर्थात वकीलों और न्यायाधीशों के भरोसे छोड़ देना चाहता है। दरअस्ल संवैधानिक न्याय सभी तरह के सामाजिक शास्त्रों और कलाओं के समावेशी ज्ञान की तार्किक मंजिल है। यह समझ न्यायपालिका के अतिरिक्त न्याय की चाहत वाले समाज के लिए भी रेखांकित होती रहनी चाहिए। इस व्यापक अर्थ में न्यायाधीश यदि खुद को अमोघ या अचूक समझते हैं, तो वे एक गलत धारणा के शिकार हैं। संविधान में यह सबसे महत्वपूर्ण है कि सार्वभौम वे ही हैं जो आर्थिक और सामाजिक हालत में सबसे निचली पायदान पर खड़े हैं। ‘हम भारत के लोग’ ही देश के सभी संवैधानिक और अन्य सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों के अंतिम आलोचक हैं। न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर अपनी तल्खी में कहते हैं ”निश्चित ही जिस तरह जज एंड कंपनी न्यायिक कार्य व्यापार निपटाते हैं, वह लोगों के सरोकार की वस्तु है और इसलिए जनता के जहान की भी। कानून का राज्य हमारे संविधान की बुनियादी अवधारणा है, लेकिन याद रहे कि कानून के राज्य का अर्थ वकीलों के राज्य से नहीं है और इसी तरह संविधान की श्रेष्ठता का अर्थ न्यायाधीशों की श्रेष्ठता से नहीं है। यह तो देश है जो बेन्च और बार दोनों को अपनी सामाजिक जांच की परिधि में रखता है।” उनके अनुसार यदि न्याय की दुनिया जाननी हो, तो प्रतिबद्ध न्यायाधीशों और वकीलों की जमात की जरूरत पड़ेगी। यह कानून के जानकारों का ऐसा समूह है, जो ‘मानवता के स्थिर और शांत संगीत के प्रति निरपेक्ष नहीं हो।’

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