Bio-Bitumen Technology : पराली से बने बायो-बिटुमिन ने खोला आत्मनिर्भर भारत का नया रास्ता
Bio-Bitumen Technology
मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि दर्ज करते हुए देश के वैज्ञानिकों ने पराली प्रबंधन (Bio-Bitumen Technology) का ऐसा स्थायी समाधान विकसित किया है, जो न केवल वायु प्रदूषण को कम करने में सहायक होगा,
बल्कि पेट्रो-बिटुमिन के आयात पर प्रतिवर्ष खर्च होने वाले 25 से 30 हजार करोड़ रुपये की बचत भी सुनिश्चित करेगा। प्रयोगशालाओं और पायलट परियोजनाओं की सफलता के बाद यह तकनीक अब व्यावसायिक उत्पादन के चरण में पहुंच चुकी है।
काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च–सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSIR-CRRI) तथा सीएसआइआर–इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (CSIR-IIP), देहरादून द्वारा विकसित इस बायो-बिटुमिन तकनीक को देशभर में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
इस उपलब्धि की सराहना करते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने नौ राज्यों की 14 कंपनियों को इसके व्यावसायिक उत्पादन के लाइसेंस सौंपे।
सीएसआइआर की महानिदेशक एन. कलाइसेल्वी ने बताया कि भारत एक ही वर्ष में जैव-बिटुमिन प्रौद्योगिकी को अनुसंधान से औद्योगिक और वाणिज्यिक स्तर तक पहुंचाने वाला विश्व का पहला देश बन गया है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में केवल बायो-बिटुमिन ही नहीं, बल्कि कई मूल्यवान सह-उत्पाद भी प्राप्त होते हैं।
यदि सड़क निर्माण के लिए जैव-बाइंडर यानी बायो-बिटुमिन (Bio-Bitumen Technology) को मुख्य उत्पाद माना जाए, तो इसके साथ गैसीय ईंधन, जैव-कीटनाशक तथा बैटरी निर्माण, जल शोधन और विभिन्न औद्योगिक उपयोगों के लिए उच्च श्रेणी का कार्बन भी प्राप्त किया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त होने के साथ-साथ पारंपरिक पेट्रो-बिटुमिन की तुलना में काफी किफायती भी है।
महानिदेशक ने जानकारी दी कि मेघालय में जोरबाट–शिलांग एक्सप्रेसवे (एनएच-40) पर बायो-बिटुमिन का उपयोग कर 100 मीटर लंबा परीक्षण खंड सफलतापूर्वक बिछाया जा चुका है। इससे इस तकनीक की जमीनी स्तर पर उपयोगिता और मजबूती प्रमाणित हो चुकी है। इस नवाचार के पेटेंट के लिए भी आवेदन किया जा चुका है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ टन बिटुमिन (Bio-Bitumen Technology) की आवश्यकता होती है, जिसमें से करीब 50 प्रतिशत का आयात करना पड़ता है। इस आयात पर हर साल 25 से 30 हजार करोड़ रुपये खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि बायो-बिटुमिन पूरी तरह बीआइएस मानकों पर खरा उतरता है, तो सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय हाईवे निर्माण में इसके उपयोग की प्रक्रिया शुरू करेगा।
हालांकि, शोध संस्थानों की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि बायो-बिटुमिन पहले ही बीआइएस मानकों पर खरा उतर चुका है। ऐसे में यह तकनीक न केवल पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान बनेगी, बल्कि देश को आयात निर्भरता से मुक्त कर आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों मोर्चों पर मजबूत बनाएगी।
