
दक्षिण भारत के पर्यटन स्थलों का शैक्षणिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक भ्रमण
छत्तीसगढ़ सरकार के सौजन्य से 29 जनवरी से 4 फरवरी तक आयोजित सात दिवसीय दक्षिण भारत भ्रमण (Yatra) कार्यक्रम के तहत प्रदेश के 14 पत्रकारों और पांच जनसंपर्क अधिकारियों को तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के प्रमुख पर्यटन, सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्थलों से रूबरू होने का अवसर मिला। यह यात्रा न केवल ज्ञानवर्धक रही, बल्कि यह भी सिखा गई कि किस तरह पर्यटन, संस्कृति और राजस्व को आपस में जोड़ा जा सकता है। जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों के सहयोग और मार्गदर्शन से यह पूरा एक्सपोजर टूर अत्यंत सफल और स्मरणीय रहा।
यात्रा की शुरुआत रायपुर से बेंगलुरु होते हुए कोयंबटूर पहुंचने के साथ हुई। रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन हम ऊटी के लिए रवाना हुए। रास्ते में ईशा फाउंडेशन स्थित 112 फीट ऊंची आदि योगी की भव्य प्रतिमा के दर्शन का अवसर मिला। यह प्रतिमा मात्र एक स्थापत्य संरचना नहीं, बल्कि योग साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का जीवंत केंद्र बन चुकी है।
वहां देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को भगवान शिव की आराधना में लीन देखा जा सकता है। युवा वर्ग को महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए प्रतिमा की परिक्रमा करते देख यह एहसास हुआ कि आस्था और अनुशासन किस तरह पीढ़ियों को जोड़ता है।

ईशा फाउंडेशन में एक अनूठा प्रयोग भी देखने को मिला—बैलगाड़ी का आधुनिक स्वरूप। टायर, ट्यूब और बैरिंग से सुसज्जित यह गाड़ी पार्किंग से प्रतिमा स्थल तक ₹10 प्रति सवारी के हिसाब से चलाई जा रही थी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि किस तरह गोवंश संरक्षण के साथ रोजगार और सुविधा को जोड़ा जा सकता है। यह प्रयोग छत्तीसगढ़ में भी अपनाया जा सकता है।

इसके बाद हमारी यात्रा ऊटी की ओर बढ़ी। नीलगिरी जिले में प्रवेश करते ही वन विभाग ने बस में मौजूद सभी प्लास्टिक की बोतलें निकलवा लीं। हमने आश्वासन दिया कि इन्हें इधर-उधर नहीं फेंका जाएगा, लेकिन सख्त नियमों के आगे सभी को झुकना पड़ा। होटल पहुंचने पर यह देखा कि प्लास्टिक के स्थान पर कांच की बोतलों में फिल्टर पानी उपलब्ध कराया जा रहा था। यह पर्यावरण संरक्षण का अनुकरणीय उदाहरण है।

अगले दिन चाय फैक्ट्री का भ्रमण कराया गया, जहां चाय पत्ती की प्रोसेसिंग से लेकर पैकेजिंग तक की पूरी प्रक्रिया को प्रत्यक्ष देखा गया। यहीं खड़े-खड़े जशपुर अंचल की चाय बागानों को लेकर चर्चा शुरू हो गई। यह महसूस हुआ कि यदि जशपुर की चाय खेती को टूरिज्म से जोड़ा जाए, प्रोसेसिंग यूनिट्स को विजिट स्पॉट बनाया जाए और फैक्ट्री आउटलेट विकसित किए जाएं, तो इससे सरकार को राजस्व मिलेगा और महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार भी।
इसके बाद नीचे स्थित चॉकलेट फैक्ट्री का भ्रमण किया गया, जहां प्रोसेसिंग की वही पारदर्शिता देखने को मिली। इससे यह स्पष्ट हुआ कि उद्योग और पर्यटन को किस तरह साथ लेकर चला जा सकता है।
यात्रा का अगला पड़ाव ऊटी का बोटैनिकल गार्डन रहा। यहां दुर्लभ और विलुप्तप्राय वनस्पतियों को संरक्षित करते हुए एक विशाल और सुंदर गार्डन विकसित किया गया है। बच्चों के खेलने, युवाओं के फोटोशूट और पर्यटकों के लिए यह स्थान आकर्षण का केंद्र है। इस तरह के गार्डन नया रायपुर या उसके आसपास विकसित किए जा सकते हैं, जिन्हें रेवेन्यू मॉडल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसके बाद हम ऊटी लेक पहुंचे। यह झील शहर के वेस्ट वाटर को दो पहाड़ियों के बीच रोककर बनाई गई है, जिसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। इसे देखकर रायपुर के बूढ़ा तालाब की याद आ गई। यदि वहां भी इसी तरह योजनाबद्ध प्रयास किए जाएं, तो वह भी आय का बड़ा स्रोत बन सकता है।

अगले दिन पाइंस फॉरेस्ट और शूटिंग स्पॉट का भ्रमण किया गया। बिना विशेष संरचना के, केवल प्राकृतिक सौंदर्य के बल पर सरकार ₹20 की टिकट से राजस्व अर्जित कर रही है। इसके बाद पैकरा फॉल देखा गया, जो सुंदर तो था, लेकिन छत्तीसगढ़ के तीरथगढ़ और चित्रकूट जलप्रपातों के सामने छोटा प्रतीत हुआ। इससे यह विश्वास और मजबूत हुआ कि हमारे राज्य में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं।

मैसूर पहुंचते ही वृंदावन गार्डन का भ्रमण कराया गया, जहां म्यूजिकल फाउंटेन ने विशेष आकर्षण पैदा किया। इसे देखकर नया रायपुर स्थित म्यूजिकल फाउंटेन की याद आई, जो किसी मायने में कमतर नहीं है। इसके बाद मां चामुंडेश्वरी मंदिर के दर्शन किए, जहां दर्शन के लिए अलग-अलग टिकट व्यवस्था लागू है। यह मॉडल डोंगरगढ़, रतनपुर और दंतेवाड़ा जैसे धार्मिक स्थलों पर भी अपनाया जा सकता है।

मैसूर पैलेस अपनी भव्यता, वास्तुकला और ऐतिहासिक धरोहर के कारण अत्यंत प्रभावशाली रहा। इसके बाद आंध्र प्रदेश स्थित तिरुपति बालाजी मंदिर के दर्शन का अवसर मिला। अनुमानित लंबी प्रतीक्षा के बावजूद, लगभग साढ़े तीन घंटे में दर्शन संपन्न हो गए, जो अपने आप में सौभाग्य की बात रही।

अंतिम चरण में बेंगलुरु विधानसभा का भ्रमण किया गया। यह भवन अपने आप में एक विशाल स्मारक है, जो प्रशासनिक गरिमा और स्थापत्य सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। शाम को हम रायपुर लौट आए और यह यादगार यात्रा संपन्न हुई।

इस एक्सपोजर टूर ने पत्रकारों, संपादकों और जनसंपर्क अधिकारियों को एक-दूसरे को समझने और बेहतर समन्वय स्थापित करने का अवसर दिया। इसके लिए विशेष रूप से संजीव तिवारी, टीम लीडर बालमुकुंद तंबोली, अनिल वर्मा, कमल बघेल, धनेंद्र बंजारे और भवानी सिंह ठाकुर सहित पूरी टीम का हृदय से आभार। मीडिया के साथियों से मिली सीख भी अमूल्य रही।
अंत में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करता हूं, जिनके प्रयास से पत्रकारों को यह समृद्ध अनुभव प्राप्त हुआ। आशा है कि भविष्य में ऐसे प्रयोग लगातार होते रहेंगे।



