संपादकीय: राइट टू रिकॉल समय की मांग

Editorial: आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चढ्ढा ने बजट सत्र के दौरान शून्य काल में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया हालांकि उनकी यह बात संसद में लगातार जारी रहे हंगामें के बीच कहीं घूम होकर रह गई। राघव चढ्ढा ने मांग की थी कि जब भारतीय लोकतंत्र में सांसद और विधायक के रूप में अपना जनप्रतिनिधि चुनने का जनता को अधिकार है तो उन्हें ऐसे जनप्रतिनिधियों को जिनका परफामेन्स खराब रहता है उन्हें वापस बुलाने का भी अधिकार मिलना ही चाहिए। अमेरिका और स्वीटरलैंड सहित बीस से ज्यादा लोकतांत्रिक देशों में लोगों को यह अधिकार मिला हुआ है लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के मतदाता इस अधिकार से वंचित है। इसलिए राइट टू-रिकॉल का अधिकार लोगों को मिलना ही चाहिए।
आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चढ्ढा की यह मांग वाकई वक्त का तकाजा है और इसके लिए सरकार को त्वरित पहल करनी ही चाहिए। प्रसिद्ध समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतेजार नहीं करती। वर्तमान में स्थिति यह है यदि निर्वाचित विधायक और सांसद जनअपेक्षा की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो भी उस क्षेत्र के मतदाताओं को उसे पांच साल तक झेलना ही पड़ता है क्योंकि जनता को ऐसे अयोग्य जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार नहीं है।
जबकि देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और यहां तक की हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को भी महाभियोग के जरिए उनके पद से समय पूर्व हटाने का प्रावधान है। यही नहीं बल्कि राज्यों की सरकारों और केन्द्र सरकार को भी अविश्वास प्रस्ताव के जरिए हटाने की संवैधानिक व्यवस्था लागू होगी। किन्तु सांसदों और विधायकों को समय पूर्व हटाने का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को उनके निर्धारित पांच साल के कार्यकाल के पूर्व हटाने के लिए राइट टू- रिकॉल का प्रावधान किया नहीं जा सकता है।
त्रिस्तरीय पंचायतों और नगरीय निकायों में निवार्चित पंच सरपंचो पार्षदों और महापौर के खिलाफ भी राइट टू- रिकॉल के जरिए उन्हें समय से पूर्व हटाने का प्रावधान है हालांकि इसकी प्रतिक्रिया बहुत बेचीदी है उसके बावजूद पंचायतों और नगरीय निकायों के अयोग्य प्रतिनिधि राइट टू- रिकॉल के जरिए हटाये गये हैं।
बस इस व्यवस्था को विधायकों और सांसदों पर लागू करने की जरूरत है लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन विधायक और सांसद ही प्रदेश व देश के लिए नियम कानून तय करते हैं ऐसे में वे भला अपने लिए राइट टू- रिकॉल की व्यवस्था लागू करके अपने हाथों अपने पैर पर भला क्यों कुल्हाड़ी मारेंगे। सरकार को इस मांग पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए इससे लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत होगा। विधायकों और सांसदों की जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ेगी।



