छत्तीसगढ़

Vedanta Plant Accident  : 25 मौतों के बाद अब अनिल अग्रवाल को बचाने प्रेशर पॉलिटिक्स शुरू, रसूख और राजनीति की आड़ में न्याय की बलि चढ़ाने की कोशिश

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में स्थित वेदांता थर्मल पावर प्लांट से उठी चिता की लपटों ने न केवल 25 निर्दोष मजदूरों की जान (Vedanta Plant Accident) ले ली, बल्कि देश के औद्योगिक सुरक्षा मानकों और कॉर्पोरेट जवाबदेही पर भी गहरा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। 14 अप्रैल को हुआ यह बॉयलर विस्फोट महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी और लाभ की अंधी दौड़ का वीभत्स परिणाम है। अब इस मामले में न्याय की उम्मीदों पर प्रेशर पॉलिटिक्स का साया मंडराने लगा है।

रसूखदारों का कवच और अनिल अग्रवाल को बचाने की कवायद (Vedanta Plant Accident)

जैसे ही जांच की आंच वेदांता समूह के चेयरमैन अनिल अग्रवाल तक पहुंचने लगी, दिल्ली के गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक उन्हें बचाने के लिए एक सुनियोजित दबाव की राजनीति  शुरू हो गई। इस खेल में सबसे पहला और चौंकाने वाला नाम सामने आया भाजपा सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल का। जिंदल ने सार्वजनिक रूप से एक्स (ट्वीट) कर एफआईआर में अनिल अग्रवाल का नाम शामिल किए जाने का विरोध किया।

जिंदल का तर्क है कि संयंत्र के दैनिक संचालन में चेयरमैन की कोई प्रत्यक्ष भूमिका (Vedanta Plant Accident) नहीं होती। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी बड़े औद्योगिक घराने का मुखिया केवल मुनाफे का हकदार होता है, मौतों की जिम्मेदारी का नहीं? क्या 25 परिवारों की बर्बादी के बाद भी शीर्ष नेतृत्व को क्लीन चिट देना उचित है? जिंदल के साथ-साथ किरण बेदी और अन्य रसूखदारों का इस मामले में कूदना यह साफ संकेत देता है कि वेदांता के खिलाफ होने वाली निष्पक्ष जांच को प्रभावित करने की हरसंभव कोशिश की जा रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की  दस्तक

जब राज्य स्तर पर जांच को दबाने की कोशिशें तेज हुईं, तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी किया है। आयोग ने दो हफ्तों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। NHRC ने स्पष्ट पूछा है कि अब तक कितने दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा गया है? घायलों और मृतकों के परिजनों की स्थिति पर भी जवाब तलब किया गया है।

लापरवाही के पुख्ता सबूत

प्रारंभिक जांच के जो तथ्य छनकर बाहर आ रहे हैं, वे रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं। सूत्रों के अनुसार प्लांट में प्रेशर फ्लक्चुएशन (दबाव में उतार-चढ़ाव) की जानकारी पहले से थी, लेकिन उत्पादन रोकने के बजाय (Vedanta Plant Accident) उसे जारी रखा गया। बॉयलर और अन्य महत्वपूर्ण इकाइयों का नियमित ऑडिट और मेंटेनेंस केवल कागजों तक सीमित था। वेदांता प्रबंधन ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए सारा दोष एनजीएसएल कंपनी पर डालने की कोशिश की है, जो कि लीपापोती का एक पुराना तरीका है।

बड़े मगरमच्छ बनाम छोटी मछलियां

जांजगीर चांपा के लोकसभा सदस्य कमलेश जांगड़े ने इस दबाव की राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए केंद्रीय मंत्रियों मनसुख मांडविया, मनोहर लाल खट्टर और पीयूष गोयल को पत्र लिखकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

सांसद का यह कदम उन आशंकाओं को पुष्ट करता है कि स्थानीय प्रशासन और औद्योगिक सुरक्षा विभाग बड़े मगरमच्छों (वेदांता के शीर्ष प्रबंधन) को बचाने के लिए छोटी मछलियों (निचले स्तर के कर्मचारी) को बलि का बकरा बना (Vedanta Plant Accident) सकता है। सांसद जांगड़े ने यह भी खुलासा किया कि जिले के उद्योगों में अब तक 218 श्रमिकों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा डराने वाला है और यह बताता है कि वेदांता जैसे संयंत्रों के लिए मजदूरों की जान की कीमत महज चंद रुपयों का मुआवजा है।

 न्याय की कसौटी पर सरकार

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आर्थिक सहायता की घोषणा की है और संभागायुक्त को 30 दिनों में जांच रिपोर्ट सौंपने को कहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जांच निष्पक्ष हो पाएगी? एक तरफ 25 मजदूरों की लाशें हैं और दूसरी तरफ देश के सबसे शक्तिशाली उद्योगपति।

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