छत्तीसगढ़

Udanti Sitanadi Tiger Reserve : आग और प्यास से जंग में जीता छत्तीसगढ़ का ये टाइगर रिजर्व, 750 जल स्रोतों और ड्रोन की ‘जादुई’ सुरक्षा से 3 साल में शून्य हुई मौतें

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व ने वन्यजीव संरक्षण की दुनिया में एक ऐसी मिसाल (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) पेश की है, जिसकी गूँज अब पूरे देश में सुनाई दे रही है। गर्मी का मौसम आते ही अक्सर जंगलों में आग और पानी की किल्लत की खबरें आती हैं, जिससे जानवर गांवों की ओर भागते हैं और इंसानों के साथ संघर्ष में जानें जाती हैं।

लेकिन इस रिजर्व ने ‘फायर-वॉटर’ नाम का एक ऐसा सुरक्षा चक्र तैयार किया है, जिसने पिछले तीन सालों से इंसानों और जानवरों, दोनों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है। यह मॉडल अब दूसरे राज्यों के लिए भी एक मिसाल बन गया है।

इंसानों और जानवरों के बीच खत्म हुई नफरत की दीवार (Udanti Sitanadi Tiger Reserve)

इस कामयाबी के पीछे सबसे बड़ी ताकत ‘फायर’ और ‘वॉटर’ वॉचर्स की टीमें हैं। रिजर्व के सभी 143 फॉरेस्ट बीट में ये टीमें तैनात हैं जो 24 घंटे पहरा देती हैं। विभाग ने जंगल के भीतर ही 750 से ज्यादा छोटे जल स्रोत यानी ‘झिरिया’ तैयार किए हैं,

ताकि हाथियों और तेंदुओं को पानी की तलाश में बस्ती तक न आना पड़े। इसके अलावा, चिन्हित इलाकों में 26 सोलर पंप भी लगाए गए हैं, जो तपती गर्मी में भी पानी की कमी नहीं होने देते। इसी का नतीजा है कि जंगली जानवर अब अपनी सीमा के भीतर ही मस्त रहते हैं।

हाइटेक निगरानी से बेनकाब हुए आग लगाने वाले

जंगल को आग से बचाने के लिए विभाग ने अब तकनीक का दामन (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) थाम लिया है। थर्मल ड्रोन और सैटेलाइट के जरिए जंगल के चप्पे-चप्पे पर नजर रखी जा रही है। अगर कोई भी शरारती तत्व जंगल में आग लगाने की कोशिश करता है, तो वह तुरंत पकड़ा जाता है।

अब तक 23 लोगों को आग लगाने के आरोप में दबोचा जा चुका है, जिससे आग की घटनाओं में भारी गिरावट आई है। यही नहीं, ये वॉचर्स शिकारियों के लिए भी काल साबित हो रहे हैं, क्योंकि शिकारी अक्सर पानी के पास ही अपना जाल बिछाते हैं।

जंगल के भरोसे जीने वाले ग्रामीणों को मिली सुरक्षा

छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में गर्मी के वक्त ग्रामीण महुआ, तेंदूपत्ता और साल के बीज इकट्ठा करने के लिए घने जंगलों के अंदर (Udanti Sitanadi Tiger Reserve) जाते हैं। पहले इस दौरान जानवरों के हमले का डर बना रहता था, लेकिन अब सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों की वजह से ग्रामीण बेखौफ होकर अपना काम कर पा रहे हैं।

लगातार तीन सालों से ‘जीरो हताहत’ का आंकड़ा यह साबित करता है कि अगर सही रणनीति और तकनीक का इस्तेमाल किया जाए, तो जंगल और जमीन दोनों को महफूज रखा जा सकता है।

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