तमिलनाडु की नई सरकार के शुरुआती फैसलों ने राजनीतिक हलकों में बड़ी बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री बनने के बाद थलापति विजय ने जिन लोगों पर भरोसा जताया, उनमें एक नाम ऐसा भी है जिसकी नियुक्ति को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। फैसले के बाद सरकार की कार्यशैली और राजनीतिक संदेश दोनों चर्चा का विषय बन गए हैं।
मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ ही समय बाद की गई दो अहम नियुक्तियों ने विवाद को जन्म दिया। एक नियुक्ति कुछ ही घंटों में वापस लेनी पड़ी, जबकि दूसरी को लेकर अब भी राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप जारी हैं। इसी वजह से वेंकट नारायण का नाम लगातार सुर्खियों में बना हुआ है।
वेंकट नारायण को मिली बड़ी जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री थलापति विजय ने फिल्म निर्माता और कारोबारी के. वेंकट नारायण को नई दिल्ली में तमिलनाडु सरकार का विशेष प्रतिनिधि नियुक्त किया। इस पद को कैबिनेट मंत्री के दर्जे के बराबर माना जाता है। नियुक्ति के बाद विपक्ष ने सवाल उठाया कि राज्य की राजनीति और प्रशासन से सीधे तौर पर जुड़े अनुभव के बिना इतनी अहम जिम्मेदारी क्यों दी गई। विपक्षी दलों ने इसे हितों के टकराव का मामला बताते हुए सरकार को घेरना शुरू कर दिया।
कौन हैं के. वेंकट नारायण
के. वेंकट नारायण केवल फिल्म निर्माता ही नहीं बल्कि चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी और कानून की पढ़ाई कर चुके पेशेवर भी हैं। फिल्म निर्माण में आने से पहले वह रियल एस्टेट क्षेत्र की प्रमुख कंपनी प्रिस्टीज ग्रुप में मुख्य कार्यकारी पद पर काम कर चुके हैं।
वर्ष 2020 में उन्होंने केवीएन प्रोडक्शंस की शुरुआत की। कम समय में यह कंपनी दक्षिण भारतीय सिनेमा की बड़ी निर्माण कंपनियों में शामिल हो गई। कंपनी ने कई चर्चित फिल्मों का निर्माण और वितरण किया है।
विजय की आखिरी फिल्म से जुड़ा खास रिश्ता
राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले थलापति विजय की आखिरी फिल्म जन नायकन का निर्माण भी केवीएन प्रोडक्शंस ने किया था। फिल्म रिलीज से पहले कानूनी विवादों और कथित पायरेसी जैसी समस्याओं में घिर गई थी।
इसी दौरान वेंकट नारायण ने परियोजना को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि दोनों के बीच लंबे समय से भरोसे का संबंध रहा है।
दूसरी नियुक्ति पर भी मचा था विवाद
वेंकट नारायण के अलावा मुख्यमंत्री ने अपने निजी ज्योतिषी को भी मुख्यमंत्री कार्यालय में विशेष दायित्व देने का फैसला किया था। इस निर्णय को लेकर भारी विरोध हुआ। लगातार उठे सवालों के बाद सरकार ने कुछ ही समय में वह नियुक्ति वापस ले ली। इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष ने सरकार पर अपने करीबी लोगों को अहम पद देने के आरोप लगाए।
विपक्ष क्यों उठा रहा है सवाल
विपक्ष का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति योग्यता और प्रशासनिक अनुभव के आधार पर होनी चाहिए। दूसरी ओर सरकार के समर्थकों का तर्क है कि वेंकट नारायण का कॉरपोरेट प्रबंधन और बड़े प्रोजेक्ट संभालने का अनुभव राज्य के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।
फिलहाल इन नियुक्तियों को लेकर तमिलनाडु की राजनीति में बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन फैसलों का किस तरह बचाव करती है और वेंकट नारायण अपनी नई जिम्मेदारी में कितना प्रभाव छोड़ पाते हैं।
