छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कारपोरेशन लिमिटेड (CGMSC) को टेंडर विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत (Tender Dispute) मिली है। शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा कारपोरेशन की कार्यप्रणाली पर की गई प्रतिकूल टिप्पणियों और याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये हर्जाना देने के आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए सभी पक्षों को नोटिस जारी कर 10 अगस्त तक जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल CGMSC को न तो एक लाख रुपये का मुआवजा देना होगा और न ही हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां प्रभावी रहेंगी।
मामला जशपुर जिले के पत्थलगांव ब्लाक स्थित कोतबा में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 50 बिस्तरों वाले अस्पताल में अपग्रेड करने के लिए जारी लगभग 4.98 करोड़ रुपये के ई-टेंडर से जुड़ा है। रायगढ़ के बी-क्लास सिविल ठेकेदार नटवर लाल अग्रवाल ने इस टेंडर में सबसे कम यानी 9.90 प्रतिशत बिलो दर की बोली लगाई थी, जबकि दूसरे ठेकेदार हितेश सूर्यवंशी की बोली 9.22 प्रतिशत कम थी। इसके बावजूद नटवर लाल अग्रवाल की वित्तीय बोली खोले बिना उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया और टेंडर हितेश सूर्यवंशी को आवंटित कर दिया गया। इसी फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
हाई कोर्ट ने कारपोरेशन पर जताई थी नाराजगी Tender Dispute
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया था कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा पूरा संवाद ईमेल के माध्यम से हो रहा था, लेकिन स्पष्टीकरण मांगने वाला महत्वपूर्ण पत्र कारपोरेशन ने ऐसी ईमेल आईडी पर भेज दिया, जिसका टेंडर प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा ने यह भी तर्क दिया कि उसी दिन और उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर ठेकेदार को कारपोरेशन के दूसरे टेंडर में तकनीकी रूप से योग्य माना गया था। हाई कोर्ट ने माना कि एक ही दस्तावेज को एक टेंडर में स्वीकार और दूसरे में अस्वीकार करना मनमाना रवैया दर्शाता है।
टेंडर बरकरार, लेकिन लगाया था एक लाख का हर्जाना
हाई कोर्ट ने यह देखते हुए कि अस्पताल निर्माण का कार्य आदेश जारी हो चुका है और परियोजना आगे बढ़ चुकी है, जनहित में टेंडर रद्द नहीं किया। हालांकि कारपोरेशन की कार्यप्रणाली को अनुचित और मनमाना बताते हुए याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया था। साथ ही फैसले में कारपोरेशन के खिलाफ कई कड़ी टिप्पणियां भी दर्ज की थीं।
सुप्रीम कोर्ट में कारपोरेशन ने दी यह दलील
छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कारपोरेशन की ओर से अतिरिक्त सालिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने सुप्रीम कोर्ट (Tender Dispute) में दलील दी कि जब हाई कोर्ट ने टेंडर आवंटन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, तब कारपोरेशन के खिलाफ इतनी कठोर टिप्पणियां करना उचित नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि जिस ईमेल आईडी पर स्पष्टीकरण भेजा गया था, वह स्वयं ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराई गई थी। ऐसे में कारपोरेशन पर हर्जाना लगाना न्यायोचित नहीं है।
10 अगस्त तक सभी पक्षों से मांगा जवाब
दलीलों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट के आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक कारपोरेशन के खिलाफ लगाए गए एक लाख रुपये के हर्जाने और फैसले में दर्ज सभी प्रतिकूल टिप्पणियों का प्रभाव स्थगित रहेगा। साथ ही सभी पक्षों को नोटिस जारी कर 10 अगस्त तक जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई अगस्त में होगी।
