Bilaspur High Court : शिक्षक भर्ती मामले में हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, सरकार को फिर से मेरिट सूची बनाने का आदेश

बिलासपुर में शिक्षक भर्ती को लेकर चल रहे विवाद ने अब बड़ा मोड़ (Bilaspur High Court) ले लिया है। भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायतों के बाद अभ्यर्थियों के बीच लंबे समय से नाराजगी बनी हुई थी। कोर्ट के फैसले के बाद अब फिर से चयन प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। भर्ती परीक्षा में शामिल कई उम्मीदवार फैसले को अपने लिए अहम मान रहे हैं।
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरक्षण और चयन प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें सामने आईं। अदालत की टिप्पणी के बाद शिक्षा विभाग और भर्ती प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों में भी हलचल बढ़ गई है। खासकर ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों के बीच इस फैसले को लेकर लगातार चर्चा हो रही है।
90 दिनों में नई मेरिट सूची बनाने का निर्देश : Bilaspur High Court
छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को 90 दिनों के भीतर नई मेरिट सूची तैयार करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस राकेश मोहन पाण्डेय की एकल पीठ ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित पदों पर तय सीमा से अधिक दिव्यांग उम्मीदवारों की नियुक्ति केवल मेरिट के आधार पर करना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
भर्ती प्रक्रिया को लेकर कोर्ट में पहुंचा मामला
याचिकाकर्ताओं उमेश कुमार श्रीवास, नेहा साहू, प्रमोद कुमार साहू और अन्य ने अदालत में बताया कि लोक शिक्षण संचालनालय ने वर्ष 2019 में व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था।
याचिका में कहा गया कि ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थियों ने मेरिट सूची में स्थान हासिल (Bilaspur High Court) किया था, लेकिन बाद में जारी चयन सूची में तय सीमा से अधिक दिव्यांग उम्मीदवारों को ओबीसी कोटे में शामिल कर लिया गया।
तीन विषयों की भर्ती पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि व्याख्याता बायोलॉजी ई संवर्ग के 200 पदों में ओबीसी वर्ग के हिस्से से 14 पद दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित होने चाहिए थे, लेकिन चयन समिति ने मेरिट के आधार पर अतिरिक्त दिव्यांग उम्मीदवारों को भी उसी कोटे में शामिल कर लिया।
इसी तरह शिक्षक गणित और सहायक शिक्षक विज्ञान भर्ती में भी समान प्रक्रिया अपनाने का आरोप लगाया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे सामान्य ओबीसी उम्मीदवारों का अवसर प्रभावित हुआ।
राज्य सरकार के तर्क पर भी हुई बहस
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि जिन दिव्यांग उम्मीदवारों का चयन हुआ, उन्होंने अपनी योग्यता के आधार पर मेरिट सूची में स्थान बनाया था। इसलिए नियमों के अनुसार उन्हें नियुक्ति दी गई। वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि यह प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों के विपरीत है और आरक्षण नियमों का सही पालन नहीं किया गया।
हाई कोर्ट ने प्रक्रिया को बताया त्रुटिपूर्ण
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि चयन समिति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पूरी तरह त्रुटिपूर्ण दिखाई देती है। अदालत ने माना कि इस तरीके से सभी वर्गों के उम्मीदवारों को समान अवसर नहीं मिल पाता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक आरक्षण और विशेष आरक्षण की प्रक्रिया अलग होती है। अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई उम्मीदवार अपनी योग्यता से सामान्य श्रेणी में चयनित होता है तो उसे अलग तरीके से देखा जाएगा, जबकि विशेष आरक्षण वाले मामलों में संबंधित सामाजिक श्रेणी के नियम लागू होंगे।



