संपादकीय

संपादकीय: किताब को लेकर व्यर्थ का बवाल

Editorial: संसद के बजट सत्र में एक किताब को लेकर व्यर्थ का बवाल खड़ा होना दुर्भाग्यजनक है। बजट पेश होने के बाद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर राज्यसभा में तो सार्थक चर्चा हुई, लेकिन, लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर होने वाली चर्चा एक किताब को लेकर हंगामों की भेंट चढ़ गई। जब तीन दिनों तक लोकसभा में कार्यवाही बार-बार बाधित होती रही तो, लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को पारित करा दिया गया।

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गौरतलब है कि, लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष को जब धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था, तो, उन्होंने बजट पर और धन्यवाद प्रस्ताव पर एक भी शब्द नहीं कहा और उसकी जगह पूर्व थलसेना अध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवडे की एक किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर सरकार पर सवालों के गोले दागने शुरू कर दिये। यह किताब अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। लेकिन, भारतीय रक्षामंत्रालय और गृह मंत्रालय ने इसे अभी तक मंजूरी नहीं दी है।

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ऐसे में, इस अप्रकाशित किताब के एक अंश को जब राहुल गांधी ने उठाया तो सत्ता पक्ष की ओर से केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और अमित शाह ने संसद की नियम और प्रक्रिया का हवाला देते हुए इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। नतीजतन सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई और राहुल गांधी अपनी बात नहीं रख पाये। लोकसभा में हंगामा बढ़ता देखकर स्पीकर ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी। बाद में जब कार्यवाही शुरू हुई तो फिर वही स्थिति बनी। दूसरे दिन भी यही सब होता रहा और उस समय स्थिति बिगड़ गई जब विपक्ष के संसद बेंच पर खड़े होकर नारेबाजी करने लगे और अध्यक्षीय आसंदी पर फाड़कर फेंकने लगे।

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नतीजतन इन आठ विपक्षी सांसदों को स्पीकर ने निलंबित कर दिया । इसके बाद बात और बिगड़ गई और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अप्रकाशित किताब लेकर संसद में पहुंच गये और यह कहने लगे कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह किताब सौंपेंगे। क्योंकि, सदन में उन्हें बोलने नहीं दिया गया है। जब, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा में संबोधन की बारी आई, तो स्थिति और विकट हो गई। लोकसभा में विपक्षी जमकर शोर-शराबा करने लगा और सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस की आठ महिला सांसदों को पीएम मोदी की कुर्सी के सामने खड़ा करके उनकी कुर्सी को ही घेर लिया। विपक्ष का इरादा पीएम मोदी को भाषण देने से रोकना था और इसमें वे सफल रहे।

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संसद पहुंच चुके पीएम मोदी को जब इस स्थिति की जानकारी हुई तो वे सदन में ही नहीं आये। यदि, प्रधानमंत्री चाहते तो सदन में आ सकते थे और उनकी कुर्सी को घेर कर खड़ी महिला सांसदों को महिला मार्शलों के जरिए वहां से हटवा सकते थे लेकिन, इससे स्थिति और बिगडऩे का खतरा था इसलिए पीएम मोदी ने संभावित टकराव को संभालने के लिए सदन में आना उचित नहीं समझा। अब, इसे विपक्ष अपनी बड़ी जीत के रूप में प्रचारित कर रहा है। नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस पर प्रतिक्रिया दी है कि, पीएम मोदी डर गये उनमें सच्चाई का सामने करने की हिम्मत नहीं है। ऐसे ही विचार प्रियंका गांधी ने भी व्यक्त किये।

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इस बीच राहुल गांधी की एक किताब के बदले भाजपा सांसद निशिकांत दुबे दर्जनों किताबों का जखीरा लेकर लोकसभा में पहुंच गये थे और उन्होंने पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी के क्रियाकलापों को लेकर उसके अंश पढऩा शुरू कर दिया। हालांकि, स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने से मना किया लेकिन वे नेहरू गांधी परिवार की बखिया उधेड़ते रहे। यदि, निशिकांत दुबे की तरह राहुल गांधी भी चाहते तो वे सत्तापक्ष की टोका-टोकी और विरोध के बावजूद उस किताब के अंश पढ़ सकते थे और संदन में अवरोध की स्थिति निर्मित नहीं होती किन्तु, वे अपनी जिद्द पर पड़े थे, जिसे, देखकर यही प्रतीत होता है कि, उस किताब को लेकर सिर्फ बवाल खड़ा करना चाहते थे, जो हो गया, लेकिन, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने किताबों का जखीरा पेशकर ईंट का जवाब पत्थर से दे दिया।

भारतीय संसद के इतिहास में शायद ही कभी ऐसी अप्रिय स्थिति निर्मित हुई होगी। जिसमें शब्दों की मर्यादा भी तूड़ी और संसदीय परंपरा का भी खुला उल्लंघन भी हुआ। यह ठीक है कि, लोकतंत्र में असहमति निहायत जरूरी है और संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस भी होनी ही चाहिए लेकिन, इसमें मर्यादा की लक्षमण रेखा का दोनों ही पक्षों को ध्यान रखना चाहिए अन्यथा, संसद राजनीति का अखाड़ा बनकर रह जाएगी और उसकी गरिमा को ठेंस लगेगी।

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