संपादकीय: राजनीति का अखाड़ा न बने संसद

Editorial: संसद के सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने हंगामा किया और ढाई दिनों तक इस हंगामे के कारण संसद की कार्यवाही बाधित हुई। संसद में हंगामा होना तो वैसे भी आम बात हो गई है। लेकिन, इस बार हद हो गई जब संसद की मर्यादा ही तोड़ दी गई नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी दो दिनों से यह आरोप लाग रहे हैं कि, उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है। वे एक कथित किताब को लेकर चीन के डोकलाम का मुद्दा उठा रहे थे पर, सत्ता पक्ष ने क्रिया का हवाला देते हुए आपत्ति उठाई थी और लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला ने भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को नियमों का पालन करने की नसीहत दी तो, राहुल गांधी ने यह कह दिया कि लोकसभा अध्यक्ष ही यह बताएं की उन्हें क्या बोलना है।
इस पर स्पीकर ओम बिरला ने भी कह दिया कि वे उनके सलाहकार नहीं है। बेहतर होगा कि, नेता-प्रतिपक्ष संसदीय नियमों का पालन करें। इस बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा और सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित करनी पड़ी। उस समय तो हास्यास्पद स्थिति बन गई जब राहुल गांधी उस किताब को लेकर ही अपनी बात करने लगे और इसे देश की सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब विपक्ष के सांसद ही हंसने लगे। इस पर टिप्पणी करते हुए अध्यक्षीय आसंदी पर विराजमान जंगदंबिका पाल ने कांग्रेसी सांसदों को यह कहकर फटकार लगाई कि वे अपने ही नेता प्रतिपक्ष की बात पर क्यों हंस रहे हैं।
बाद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तकरार इस कदर बढ़ी कि विपक्षी सांसद टेबल पर चढ़कर आसन की ओर पेपर फेकने लगे, इस पर कड़ी आपित्त दर्ज कराते हुए, लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के आठ सांसदों को संसद के पेश बजट सत्र के लिए निलंबित कर दिया। अब तीसरे दिन वे निलंबित सांसद संसद परिसर में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार पर तानाशाही का आरोप लगा रहे हैं। वहीं संसद के भीतर भी विपक्षी सांसद लगातार हंगामा कर रहे हैं। इस दौरान एक और अप्रिय घटना हो गई। जब केन्द्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू संसद में पहुंचे तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने उन्हें गद्दार दोस्त कहकर संबोधित किया और उनकी ओर हाथ बढ़ाया।
इस पर रवनीत सिंह बिट्टू ने उन्हें तुर्की-ब-तुर्की जवाब देते हुए कह दिया कि वे देश के दुश्मनों से हाथ नहीं मिलाते। कुल मिलाकर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सार्थक चर्चा होनी थी और विपक्ष को बजट पर अपने महत्वपूर्ण सुझाव देने थे, जिसके लिए, उन्हें पर्याप्त समय दिया गया था। इस बार के बजट में ऐसी कई बातें है, जिसे लेकर विपक्ष चाहता तो सरकार को आड़े हाथों ले सकता था और उसे कटघरे में खड़ा कर सकता था, किन्तु, विपक्ष ने यह सुनहरा अवसर गवा दिया और व्यर्थ का बवाल खड़ा करके सरकार को बजट प्रावधानों को लेकर अपनी किरकिरी होने से बचने का मौका दे दिया।
बेहतर होता कि विपक्ष संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के लिए उसे दिये गये समय का सदुपयोग करता और सरकार पर निशाना साधता, यह एक जिम्मेदार विपक्ष का कत्वर्य होता है कि, वह संसद सत्र के दौरान सरकार की खामियों को उजागर करे। किन्तु, पिछले कुछ सत्रों की तरह ही विपक्ष ने बजट सत्र में भी हंगामा करके इस सत्र को भी हंगामों की भेंट चढ़ा दिया। विपक्ष के अन्य नेता जो बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहते थे और बजट के कुछ प्रावधानों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराकर उसमें संसोधन कराने की इच्छा रखते थे, उन्हें भी इसका मौका नहीं मिल पाया।
यह स्वस्थ लोकतंत्र के हित में नहीं है कि संसद के महत्वपूर्ण सत्र जिन पर देश की जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई लगती हो वह व्यर्थ के बवाल के कारण हंगामों की भेंट चढ़ता रहे। संसद को सुचारू रूप से चलाना जितनी सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी होती है।
उतनी ही जिम्मेदारी विपक्ष की भी होती है कि, संसद सत्र में जनहित के काम होते रहे लेकिन लगता है कि, विपक्ष ने यह ठान कर रख लिया है कि, उन्हें संसद को बाधित करके ही अपनी ताकत दिखानी है, इसके लिए वे संसदीय परंपराओं को भी तार-तार करने से नहीं हिचकते और न ही संसद की गरिमा को ठेंस पहुंचाने से भी वे बाज नहीं आते। ऐसा लगता है कि सिर्फ हंगामा खडा करना ही उनका मकसद रह गया है। इसीलिए वे संसद को राजनीति के अखाड़े के रूप में तब्दील करने लगे हैं। विपक्ष का यह रवैया सत्ता पक्ष को भी रास आता है क्योंकि, हंगामें के कारण सदन की कार्यवाही बाधित होने से सरकार अपनी जवाबदेही से बच जाती है।



