उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर सियासी खींचतान के संकेत मिलने लगे हैं। दोनों दलों के नेताओं के सार्वजनिक बयानों ने गठबंधन के भीतर सीटों की दावेदारी को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। हालांकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार विपक्षी एकता और गठबंधन को मजबूत करने का संदेश दे रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव से पहले गठबंधन की राजनीति में दबाव बनाने की रणनीति आम बात है। सीटों पर बातचीत शुरू होने से पहले दोनों दल अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि वे कमजोर स्थिति में नहीं हैं। यूपी में भी सपा और कांग्रेस के बीच कुछ ऐसा ही राजनीतिक माहौल बनता दिखाई दे रहा है।
लोकसभा चुनाव के बाद बदला गठबंधन का समीकरण
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। INDIA गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करते हुए 43 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 36 सीटों पर संतोष करना पड़ा था।
इस परिणाम ने दोनों दलों को भरोसा दिया कि साथ मिलकर भाजपा को चुनौती दी जा सकती है। अब 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सबसे बड़ा सवाल सीट बंटवारे का है।
कांग्रेस का तर्क है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन को मजबूत करने में उसकी भूमिका अहम रही और उसे विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक सीटें मिलनी चाहिए। वहीं सपा का मानना है कि विधानसभा चुनाव का गणित लोकसभा से अलग होता है। यहां उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, संगठन की ताकत और जीतने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण होगी।
कांग्रेस की नजर बराबरी की हिस्सेदारी पर
कांग्रेस के कुछ नेताओं के हालिया बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी इस बार सीट बंटवारे में ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने हाल ही में कहा था कि भविष्य के गठबंधन 50-50 साझेदारी के आधार पर होने चाहिए।
इसके पहले भी उन्होंने सपा के साथ सीट साझेदारी और संगठनात्मक स्थिति को लेकर बयान दिए थे। इन बयानों के बाद सपा नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व से सार्वजनिक बयानबाजी पर संयम बरतने की अपील की थी।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने भी कहा है कि कांग्रेस इस बार सम्मान और बराबरी के आधार पर चुनाव लड़ना चाहती है। कांग्रेस के भीतर यह सोच है कि अगर पार्टी को राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करनी है तो उसे अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना होगा।
सपा ने याद दिलाया पुराना चुनाव प्रदर्शन
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी नेताओं का कहना है कि सीटों का बंटवारा केवल राजनीतिक दावों के आधार पर नहीं हो सकता। सपा नेताओं का तर्क है कि 2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 107 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिला था, लेकिन पार्टी केवल सात सीटें जीत सकी थी।
सपा का मानना है कि विधानसभा चुनाव में वही उम्मीदवार मजबूत होगा, जिसकी क्षेत्र में पकड़ और जीत की संभावना अधिक होगी। इसलिए सीटों का फैसला इसी आधार पर किया जाना चाहिए।
शीर्ष नेतृत्व दे रहा है एकता का संदेश
बयानों के बीच राहुल गांधी और अखिलेश यादव लगातार गठबंधन को लेकर सकारात्मक संदेश दे रहे हैं। दोनों नेता भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की जरूरत पर जोर देते रहे हैं।
राहुल गांधी ने अखिलेश यादव को जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए सोशल मीडिया पर पीडीए की भागीदारी और सामाजिक न्याय के संकल्प को आगे बढ़ाने की बात कही थी। इसे दोनों दलों के बीच भरोसे के संकेत के रूप में देखा गया।
सपा नेताओं का कहना है कि गठबंधन को मजबूत रखने के लिए सार्वजनिक बयानबाजी से बचना जरूरी है। उनका दावा है कि कुछ नेता व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं।
क्या यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभी दोनों दल अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस अधिक सीटों की मांग कर बातचीत की शुरुआती सीमा तय करना चाहती है, जबकि सपा सीटों की संख्या को लेकर अभी अपने विकल्प खुले रखना चाहती है।
हालांकि गठबंधन का अंतिम स्वरूप राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच होने वाली बातचीत से ही तय होगा। राज्य स्तर के नेताओं के बयान भले ही राजनीतिक माहौल गर्म कर रहे हों, लेकिन सीट बंटवारे का अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगा।



