झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने रविवार (3 मई) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर एक महत्वपूर्ण मांग दोहराई है। सोरेन ने केंद्र सरकार से अपील की है कि आगामी जनगणना प्रक्रिया में आदिवासी समुदाय के लिए ‘सरना धर्म कोड’ का प्रावधान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आदिवासियों की विशिष्ट पहचान और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य है।
50 लाख लोगों की धार्मिक पहचान का हवाला Sarna Religious Code
प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजे गए पत्रों में सोरेन ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख (Sarna Religious Code) किया। उन्होंने बताया कि उस समय सरना के लिए कोई अलग श्रेणी नहीं होने के बावजूद, देश के 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने स्वेच्छा से धर्म के कॉलम में खुद को ‘सरना’ दर्ज कराया था। सोरेन ने कहा कि यह इस समुदाय के अपने धर्म के प्रति गहरे भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।
प्रकृति पूजा और विशिष्ट परंपराएं (Sarna Religious Code)
मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि सरना धर्म की अपनी अलग परंपराएं हैं, जिनमें प्रकृति की पूजा और ग्राम देवताओं की आराधना प्रमुख है। उन्होंने पत्र में लिखा कि जनगणना में इस धर्म को मान्यता मिलने से न केवल सटीक डेटा प्राप्त होगा, बल्कि आदिवासियों के लिए अधिक प्रभावी कल्याणकारी नीतियां बनाने में भी मदद मिलेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि नई श्रेणियां जोड़ने से प्रक्रिया थोड़ी जटिल हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ संभावित चुनौतियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
घटती आबादी और पहचान का संकट
सोरेन ने चिंता जताई कि पिछले आठ दशकों में झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या 38 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत रह (Sarna Religious Code) गई है। उन्होंने कहा कि जब देश में समान नागरिक संहिता (UCC) जैसी चर्चाएं हो रही हैं, ऐसे में प्रकृति पूजक आदिवासी समाज की पहचान को सुरक्षित करना आवश्यक है। उल्लेखनीय है कि झारखंड विधानसभा ने 2020 में ही सरna कोड के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था। वर्तमान में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के आदिवासी संगठन भी इसी तरह की मांग उठा रहे हैं।
