Sahitya Mahotsav India : शब्दों की गूंज से जागा देश, रायपुर साहित्य उत्सव ने रचा विचारों का इतिहास
Sahitya Mahotsav India
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अटल नगर नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन (Sahitya Mahotsav India) में 23 से 25 जनवरी तक आयोजित राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव ने राज्य की सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान को राष्ट्रीय फलक पर मजबूती से स्थापित किया। जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित और साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न यह तीन दिवसीय रायपुर साहित्य उत्सव केवल कार्यक्रमों की श्रृंखला नहीं, बल्कि विचारों, संवादों और रचनात्मक ऊर्जा का जीवंत मंच बनकर सामने आया।
इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान में भी पूरी चेतना के साथ सक्रिय है। जिस सुव्यवस्थित योजना, विषय चयन और प्रस्तुति के साथ उत्सव का संचालन हुआ, उसने साहित्य प्रेमियों को गहराई से प्रभावित (Sahitya Mahotsav India) किया। तीन दिनों में आयोजित 42 सत्रों में देश और प्रदेश के करीब 120 प्रतिष्ठित लेखक, कवि, पत्रकार, शिक्षाविद और विचारक शामिल हुए। दस हजार से अधिक पंजीकृत साहित्य प्रेमियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को जनभागीदारी का स्वरूप दे दिया।
राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव का उद्घाटन राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कर कमलों से हुआ। उद्घाटन सत्र में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि कवि, लेखक और पत्रकार उस दौर में राष्ट्र की आत्मा के संवाहक थे। वहीं हरिवंश नारायण सिंह ने कहा कि राजनीति समय के साथ बदलती है, लेकिन साहित्य पीढ़ियों तक समाज की चेतना को जीवित रखता है।
उत्सव के पहले दिन शाम को पद्मश्री सम्मानित अभिनेता मनोज जोशी द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘चाणक्य’ ने बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर गहरा प्रभाव छोड़ा। सत्ता, नीति और नैतिकता के सवालों को संवादों के माध्यम से प्रस्तुत करते इस नाटक ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने का अवसर दिया।
छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक साहित्य पर केंद्रित सत्रों में वरिष्ठ कवियों और साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रदेश की मिट्टी, संस्कृति और लोक संवेदनाओं को स्वर (Sahitya Mahotsav India) दिया। इन चर्चाओं में लोकभाषा की सामाजिक शक्ति और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श हुआ।
दूसरे दिन भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में विशेष काव्य पाठ आयोजित किया गया, जिसमें देश के प्रतिष्ठित कवियों ने राष्ट्र, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जुड़ी रचनाओं का पाठ किया। यह सत्र साहित्य और राष्ट्रबोध के आत्मीय संबंध को रेखांकित करता नजर आया।
संविधान और भारतीय मूल्यों पर केंद्रित सत्र में संविधान को केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया। वक्ताओं ने लोकतांत्रिक चेतना, सांस्कृतिक जड़ों और संवैधानिक मूल्यों पर विस्तार से विचार रखे। इसी क्रम में शासन और साहित्य विषय पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि शासन समाज को दिशा देता है और साहित्य उसे संवेदना प्रदान करता है।
हिंदी सिनेमा और समाज के रिश्ते पर हुए संवाद में फिल्मकारों और इतिहासकारों ने सिनेमा को समाज का प्रतिबिंब और प्रभावी माध्यम बताया। युवाओं की बड़ी भागीदारी ने इस सत्र को खास बना दिया। बाल साहित्य पर केंद्रित चर्चा में बच्चों में पढ़ने की आदत को लेकर चिंता जताई गई, साथ ही इसे पुनर्जीवित करने के उपायों पर भी जोर दिया गया।
पत्रकारिता और साहित्य के साझा सरोकारों पर आयोजित चर्चा में वक्ताओं ने कहा कि दोनों का मूल उद्देश्य समाज के प्रति उत्तरदायित्व (Sahitya Mahotsav India) है। तथ्य और संवेदना, इन दोनों क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। इसके साथ ही चित्रकला और कार्टून प्रदर्शनी ने साहित्य उत्सव को दृश्य कला से भी जोड़ा।
समापन समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि तकनीक और सोशल मीडिया के दौर में भी साहित्य की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने इस आयोजन को विचारों की प्रयोगशाला बताते हुए भविष्य में इसे और व्यापक स्वरूप देने की आवश्यकता पर बल दिया।
तीन दिनों तक चला यह रायपुर साहित्य उत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की सशक्त घोषणा बनकर सामने आया। शब्दों के इस महाकुंभ ने न केवल देश को साहित्यिक चेतना का संदेश दिया, बल्कि छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग भी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से की।
