Ration Shop Irregularities : ऑनलाइन घोषणा के नाम पर ऑफलाइन वसूली, गरीबों के राशन पर हर महीने भारी डाका
Ration Shop Irregularities
कागज़ों में सब कुछ डिजिटल, पारदर्शी और नियमों के मुताबिक दिखता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। एक ऐसी प्रक्रिया, जिसे व्यवस्था को आसान बनाने के लिए शुरू किया (Ration Shop Irregularities) गया था, अब धीरे-धीरे दबाव, डर और मजबूरी का जरिया बन चुकी है। हर महीने एक तय रकम के बिना काम आगे नहीं बढ़ता और इसका असर वहां पड़ता है, जहां आवाज़ सबसे कमजोर होती है।
बिलासपुर में गरीबों को मिलने वाले सस्ते राशन पर हर महीने सुनियोजित तरीके से बट्टा लगाया जा रहा है। जिले में संचालित शासकीय उचित मूल्य दुकानों से महीने के स्टॉक और वितरण की जानकारी ऑनलाइन जमा कराने के नाम पर हजारों रुपए की अवैध वसूली की जा रही है। हालात ऐसे हैं कि तय रकम जमा किए बिना दुकानदारों का घोषणा पत्र स्वीकार ही नहीं किया जा रहा।
पीडीएस दुकानों का संचालन कर रहे कई संचालकों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि हर महीने उन्हें स्टॉक का ऑनलाइन घोषणा पत्र जमा करना पड़ता है। यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से कहीं से भी की (Ration Shop Irregularities) जा सकती है, लेकिन व्यवहार में उन्हें खाद्य विभाग द्वारा तय की गई जगह पर ही जाकर यह घोषणा पत्र जमा करने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं, प्रति दुकान दो से तीन हजार रुपए की रकम अनौपचारिक रूप से वसूल की जाती है।
डर के साए में दुकानदार, राशन पर पड़ रहा असर
घोषणा पत्र समय पर जमा नहीं होने पर आवंटन रोक दिए जाने का डर दुकानदारों को चुप रहने पर मजबूर कर देता है। विभागीय निरीक्षकों के मातहत कर्मचारियों के जरिए यह दबाव बनाया जाता है कि तय स्थान से ही ऑनलाइन एंट्री कराई जाए। दुकानदार जानते हैं कि वे यह काम स्वयं भी कर सकते हैं, लेकिन विभागीय व्यवस्था के खिलाफ जाने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा।
जिले में हर माह लाखों की अवैध वसूली
जिले में इस समय करीब 700 पीडीएस दुकानें संचालित हैं। यदि प्रत्येक दुकान से औसतन दो हजार रुपए भी वसूले जाएं, तो हर महीने करीब 14 लाख रुपए की अवैध वसूली का आंकड़ा सामने (Ration Shop Irregularities) आता है। जानकारों का कहना है कि कुछ मामलों में यह राशि इससे भी ज्यादा पहुंच जाती है।
भरपाई होती है गरीबों के हिस्से से
दुकान संचालक जिस रकम को जबरन देने के लिए मजबूर होते हैं, उसकी भरपाई अंततः गरीब उपभोक्ताओं के राशन से की जाती है। कहीं तौल में कमी, कहीं वितरण में गड़बड़ी, इस पूरे सिस्टम का बोझ सीधे जरूरतमंद परिवारों पर पड़ रहा है।
पहले रजिस्टर, अब ऑनलाइन लेकिन खर्च बढ़ा
वर्ष 2015 तक राशन वितरण का पूरा हिसाब-किताब रजिस्टर में दर्ज किया जाता था। बाद में ऑनलाइन प्रणाली लागू की गई, ताकि पारदर्शिता बढ़े। लेकिन समय के साथ यह प्रक्रिया दुकानदारों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बनती चली गई। ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद न तो लॉगिन आईडी दी जाती है और न ही स्वतंत्र रूप से जानकारी भरने की छूट।
विरोध की हिम्मत नहीं
पीडीएस दुकानदारों का कहना है कि अगर वे इस व्यवस्था का विरोध करते हैं, तो दुकान संचालन का अधिकार छिनने का खतरा बना रहता है। इसी भय के कारण हर महीने तय रकम चुकाकर घोषणा पत्र जमा कराया जा रहा है।
