Political battle moves from on the Supreme Court: सड़क से सुको पहुंची सियासी लड़ाई

चुनाव आयोग (Political battle moves from on the Supreme Court) द्वारा कराये जा रहे एसआईआर तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में पूरा विपक्ष एक जुट होकर निर्णायक संघर्ष का शंखनाद कर चुका है। यह सियासी लड़ाई अब सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट का चाहे जो फैसला आये कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन इस लड़ाई को आगे भी जारी ही रखेगा।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद अपने निवास में इंडी गठबंधन के प्रमुख नेताओं की बैठक बुलाई और आगे की रणनीति पर चर्चा की बाद में सभी विपक्षी नेताओं ने संयुक्त पत्रकार वार्ता लेकर प्रमुख रूप से यही एक बात कही कि जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा नहीं हो जाता और एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक नहीं लग जाती तब तक उनकी यह लड़ाई जारी रहेगी। राहुल गांधी ने विपक्ष की भावी रणनीति का खुलासा तो नहीं किया लेकिन इतना कहा कि अब यह लड़ाई पूरे देश में लड़ी जाएगी भले ही इसमें हमें वक्त लगे दो चार महीने ही नहीं बल्कि साल दो साल लग जाये लेकिन जब तक हम अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर लेंगे तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।
इसका मतलब साफ है कि मौजूदा एनडीए सरकार के खिलाफ मुद्दाविहीन विपक्ष को जो यह मुद्दा हाथ लगा है उसे वह हरगिज अपने हाथों से नहीं जाने देगा। किन्तु इंडी गठबंधन में शामिल दल अपने अपने राज्यों में यह लड़ाई कैसे लडेेंग़े और क्या वहां भी उनकी एकता बनी रहेगी यह एक विचारणीय विषय है। गौरतलब है कि केरल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही वे किसी मुद्दे पर एक हो जायें लेकिन राज्यों में इनके बीच एकता संभव नहीं है। पंजाब में भी आम आदमी पार्टी की सरकार है और वहां आप और कांग्रेस एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी हैं। वैसे भी आम आदमी पार्टी एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपनी खिचड़ी अलग पका रही है।
उड़ीसा में भी कांग्रेस और बीजद एक दूसरे के आमने सामने रहती हैं। कमोवेश ऐसी स्थिति अन्य गैरभाजपा शासित राज्यों में भी है। ऐसी स्थिति में ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन कितना लंबा चलेगा यह कह पाना मुहाल है। किन्तु कांग्रेस अपनी जिद पर ही अड़ी हुई है। कांग्रेस के इस आंदोलन को लेकर गृहमंत्री अमित शाह ने राहुल गांधी पर यह कहकर निशाना साधा है कि कांग्रेस पार्टी चाहे जो कर ले 2029 में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की ही सरकार बनेगी और कांग्रेस को चौथी बार भी हार का सामना करना पड़ेगा। राहुल गांधी आंदोलन छेड़ें या झूठ की गूंज करें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अमित शाह ने राहुल गांधी को सलाह दी है कि वे आत्मचिंतन करें कि उनकी पार्टी हर चुनाव में हार क्यों रही है।
रही बात ईवीएम की तो गुजरात और त्रिपुरा के नगरीय निकाय चुनाव में बैलेट पेपर से ही मतदान कराया गया था और दोनों जगह कांग्रेस को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। एसआईआर के विरोध के चलते ही असम की एक लोकसभा सीट और बंगाल की दो विधानसभा सीटों पर भी भाजपा को प्रचंड जीत मिली है। वहीं पुडूचेरी में एनडीए को जीत मिली और तमिलनाडु में विजय जोसेफ थलपति की पार्टी को दोनों सीटों पर विजय मिली। कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आई। अन्य भाजपा नेताओं ने भी राहुल गांधी और इंडी गठबंधन में शामिल पार्टियों के नेताओं पर निशाना साधा है कि ये जहां भी चुनाव हारते हैं तो चुनाव आयोग (Political battle moves from on the Supreme Court) पर उंगलियां उठाते हैं और जहां जीत जाते हैं वहां वे इसे लोकतंत्र की जीत बताने लगते हैं।
जहां तक प्रश्न चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग का है तो यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है जहां इस पर सुनवाई होने जा रही है। इंडी गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर वहां इस बारे में और कई याचिकाएं दायर की हैं लेकिन उन पर सुनवाई टल गई है क्योंकि उन याचिकाओं में 14 गलतियां हैं। किसी में वकालतनामा ही नहीं लगाया गया है तो किसी में दस्तावेजों के प्रिंट साफ नहीं है। यहां तक की कोर्ट फीस भी कम अदा की गई है। बहरहाल अब सुप्रीम कोर्ट में ही यह तय होगा कि एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक लगेगी या नहीं। मुख्य चुनाव आयुक्त (Political battle moves from on the Supreme Court) ज्ञानेश कुमार को तो सुप्रीम कोर्ट भी नहीं हटा सकता।
उन्हें हटाने का अधिकार संसद को है जहां उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाकर ही उन्हें पद से हटाया जा सकता है किन्तु इसके लिए संसद में विपक्ष को दो तिहाई बहुमत हासिल होना चाहिए जो नहीं है, ऐसे में ज्ञानेश कुमार का हटना असंभव है। यह बात विपक्ष भी जानता है इसीलिए वह संसद में की जाने वाली लड़ाई को सड़क पर लडऩे के लिए उतारू है। देखना होगा कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां इस आंदोलन को कितना आगे ले जाती हैं और इस सियासी कवायद का क्या नतीजा निकलता है।



