छत्तीसगढ़

PM Kisan Minors : बच्चों के खाते, बुजुर्गों की लापरवाही – कैसे 531 नाबालिगों ने अनजाने में पा लिया पीएम-किसान का लाभ

PM Kisan Minors : आमतौर पर हर गाँव की रटना-सी बात होती है: सरकारी स्कीमें, दस्तावेज़ और पहचान पत्र। मगर इस बार वही दस्तावेज़ 531 बच्चों के लिए राह बन गए – वह राह, जो नियमों के उलट, उन्हें किसान-सहायता के पैसे तक पहुंचा रही थी।

स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि पैठ-रहित रिमोट पंजीकरण, आंशिक केवाइसी और कागजों में एडिटिंग के कारण इस त्रुटि का जन्म हुआ। प्रारंभिक नज़रिए में लगता है कि कोई बड़ा साजिश नहीं, बल्कि प्रणालीगत खामियां और भूलें जिम्मेदार हैं – पर क्या यही पूरी कहानी है? क्षेत्रीय स्तर पर जमीन के कागजात पर अभिभावकों द्वारा हस्तक्षेप की भी आशंका जताई जा रही है।

यह भी सामने आया कि कई मामलों में बच्चों के आधार या राशन-कार्ड के फोटोकॉपी देखकर ही प्रक्रिया पूरी कर ली गई थी; वीडियो-ऑथेंटिकेशन या लाइव बायोमीट्रिक तुलना छूट (PM Kisan Minors) गई। कुछ पंचायतों में अधिकारियों ने माना कि काम का दबाव और दस्तावेजों की भीड़ में सही उम्र-जांच नहीं हो सकी। परिणाम – साल दर साल जमा होती आर्थिक सहायता, जो नियमों के अनुसार 18 वर्ष से ऊपर के किसानों को ही मिलनी चाहिए थी, बच्चों के खातों में चली गई।

अब विभाग ने दो कदम उठाए हैं, संभावित हितग्राहियों की सूची सार्वजनिक कर उन्हें नोटिस भेजना, और आगे की किस्तें रोकना। जिनके पास 18 वर्ष होने का प्रमाण होगा, उन्हें नया केवाइसी कराके मदद जारी रखने का मौका मिलेगा; अन्यथा वसूली व कानूनी प्रक्रिया (PM Kisan Minors) चलेगी। ग्रामीण नेताओं का अनुरोध है कि आगे से पंजीकरण में एक-दो स्तर और जोड़ दिए जाएँ: फ़ील्ड-ऑडिट, लाइव-बायोमीट्रिक और स्थानीय पंचायती सत्यापन।

इस खुलासे ने एक बात साफ कर दी है: नीतियाँ भले ही सही हों, पर क्रियान्वयन की चूक गरीबों के लिए बड़े असर छोड़ सकती है, इसलिए प्रणाली को सुगठित करने का प्रश्न अब प्राथमिकता बन चुका है।

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