संपादकीय: एफसीआरए बिल का विरोध

Opposition to the FCRA Bill: सरकार संसद के मानसून सत्र में विदेशी अंशदान(विनियमन) संसोधन विधेयक(एफसीआरए बिल) पेश करने जा रही है। इस बिल के पेश होने की सुगबुगाहट लगते ही इसाई समुदाय ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। ईसाई समुदाय के एक प्रतिनिधि मंडल ने गृहमंत्री अमित शाह से भेंट कर उनके सामने एफसीआरए बिल पर आपत्ति जताई है। उन्होंने मांग की है कि सरकार इस बिल को वापस ले ले। यदि इसे संसद में पेश ही करना है तो फिर इय बिल को संयुक्त संसदीय समीति के पास भेजे।

गृह मंत्री अमित शाह से मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने भी मुलाकात की और इस बिल के छह मुद्दो पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें आशवासन दिया है कि सरकार उनकी आपत्तियों पर भी विचार करेगी। गौरतलब है कि एफसीआरए बिल का विदेशी और भारतीय मिसनरी संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस बिल के पारित हो जाने से उनकी संस्थाओं से विदेशी फंड मिलना मुश्किल हो जाएगा। वहीं दूसरी ओर देश में कुकुरमुत्तों की तरह उगने वाले एनजीओ भी इस बिल की मुखालफत कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशी अंशदान (विनियमन) विधेयक पहले ही संसद में पारित हो चुका है।

अब इसमें सरकार संसोधन करने जा रही है जिसके मुताबिक अब विदेशी फंडिंग का हिसाब देना होगा। विदेशों से मिलने वाली सारी फंडिंग नई दिल्ली स्थित एक ही एसबीआई बैंक में आएगी। इस बिल में किये गये संसोधन में यह भी शामिल है कि अब ऐसे एनजीओं जिन्हें विदेशी फंड मिलता है वे सिर्फ उस फंड का 20 प्रतिशत हिस्सा ही पर्सनल खर्च कर पाएंगे। जबकि पहले वे फंड का पचास प्रतिशत हिस्सा पर्सनल खर्च करते थे और इसी में सारा गोलमाल होता था। इस संसोधन का ही एनजीओ पुरजोर विरोध कर रहे हैं।

उन्हें इस बात पर भी आपत्ति है कि सरकार ने अनियमितताओं के आरोप में जिन एनजीओ का लाइसेन्स रद्द कर दिया है या आगे चलकर रद्द करेगी। उनकी संपत्ति भी सरकार के पास चली जाएगी। कुल मिलाकर अब असानी से विदेशी फंडिंग नहीं आ पाएगी और जिन संस्थाओं को विदेशी फंड मिलेगा अब उन्हें उसके पाई पाई का हिसाब देना पड़ेगा। कोई भी संस्था इसमें गोलमाल नहीं कर पाएगी। यही वजह है कि इसाई समुदाय और एनजीओ एफसीआरए बिल का विरोध कर रहे हैं।

भारत में विभिन्न संस्थाओं को फंड देकर अपना एजेंडा चलाने वाले अमेरिका, इंग्लैंड और पाकिस्तान जैसे देश भी इसका विरोध कर रहे हैं। सरकार की मंसा है कि विदेशी फंड जो देश विरोधी ताकतों का हथियार बना हुआ था उसकी धार को कुंद किया जाये। खासतौर पर इसाई मिसनरियों की फंडिंग में कमी लगाई जाये और उसमें पारदर्शिता लाई जाये। उल्लेखनीय है कि मिसनरियों पर लंबे समय से भारत में धर्मांतरण कराने का आरोप लगता रहा है। खासतौर पर आदिवासी बहुल क्षेत्रों मे मिसनरियां ज्यादा सक्रिय रहती है और इनसे जुड़े लोग गरीब आदिवासियों से पैसों का लालच देकर या अन्य सुविधायं मुहैया कराकर उनका धर्मांतरण कराते रहे हैं। यही वजह है कि वे इस बिल का ज्यादा विरोध कर रही हैं।

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