O Romeo Movie Review : खून, इश्क़ और इंतक़ाम की कविता, शाहिद चमके, मगर ‘ओ रोमियो’ दूसरे हाफ में ठहर गई

O Romeo Movie Review

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विशाल भारद्वाज की फिल्मों से दर्शक एक खास मूड की उम्मीद (O Romeo Movie Review) रखते हैं – धीमी आंच पर सुलगता प्यार, रहस्यमयी हिंसा और शब्दों में कविता। ओ रोमियो उसी वादे के साथ शुरू होती है, लेकिन अंत तक आते-आते वह असर बरकरार नहीं रख पाती।

कहानी की धड़कन

फिल्म एक गैंगस्टर उस्तारा की कहानी कहती है, जो प्यार के बाद बदले की राह पर चलता है। यह प्रेम, अपराध और नैतिक द्वंद्व का मेल है – जहां भावनाएं बोलती हैं, पर स्क्रिप्ट कभी-कभी ठहर जाती है।

निर्देशन: खूबसूरत, पर अधूरा

विशाल भारद्वाज का ट्रीटमेंट पोएटिक है। पहले हाफ में टेंशन, रिदम और सिनेमैटिक फ्रेम्स बांध लेते हैं। मगर दूसरा हाफ ढीला पड़ता है – ट्विस्ट आते हैं, पर चौंकाते नहीं। यही वह मोड़ है जहां फिल्म की पकड़ छूटती है।

अभिनय: फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष

शाहिद कपूर यहां कंधों पर फिल्म उठाते हैं। उनकी परफॉर्मेंस में इंटेंसिटी और नर्मी का दुर्लभ संतुलन है – खतरनाक होते हुए भी संवेदनशील। तृप्ति डिमरी अफशां के किरदार में खामोशी से बहुत कुछ कह जाती हैं; उनकी आंखें संवाद बन जाती हैं।
सपोर्टिंग कास्ट असर (O Romeo Movie Review) छोड़ती है, नाना पाटेकर का संयमित असर, अविनाश तिवारी की डर पैदा करती मौजूदगी और कैमियो में विक्रांत मैसी जैसे कलाकार याद रहते हैं।

संगीत और संवाद

विशाल भारद्वाज की फिल्मों में संगीत कहानी को आगे बढ़ाता है। यहां भी गाने रुकावट नहीं बनते – वे भावनाओं की परतें खोलते हैं। कुछ संवाद लंबे समय तक याद रहते हैं और किरदारों की मनःस्थिति साफ कर देते हैं।

कहां चूक गई फिल्म?

इमोशनल आर्क दूसरे हाफ में उतनी गहराई नहीं पकड़ पाता जितनी (O Romeo Movie Review) जरूरत थी। आइडिया दमदार है प्यार और हिंसा का सहअस्तित्व – पर लेखन उसे पूरी तरह साध नहीं पाता। नतीजा: खूबसूरत अनुभव, पर अधूरा संतोष।

अंतिम फैसला

ओ रोमियो में मूड है, शानदार अभिनय है और कविता जैसी फील है – खासतौर पर शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी के लिए देखी जा सकती है। लेकिन कमजोर दूसरा हाफ फिल्म को ऊंचाई तक नहीं पहुंचने देता।
रेटिंग: 2.5/5

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