संपादकीय: अब घर के भेदी लंका ढाएंगे

Editorial: बंगाल विधानसभा चुनाव में नई दिल्ली में बड़ा खेला हो गया। आम आदमी पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 सांसदों ने पाला बदल लिया। इस तरह दो तिहाई से भी ज्यादा सांसदों के भाजपा में शामिल होने से उनकी संसदीय बरकरार रहगी। गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य राघव चढ्ढा को हाल ही में राज्यसभा के उपनेता पद से हटाया गया था और उसी समय से यह कयास लगाये जा रहे थे कि राघव चढ्ढा आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम सकते हैं किन्तु किसी ने भी यह अनुमान नहीं लगाया था कि वे अपने साथ और आधा दर्जन राज्यसभा सांसदों को भाजपा में ले जाएंगे और आम आदमी पार्टी में बगावत का बिगुल फूंक देंगे।

यहां तक की खुद को सर्वज्ञानी समझने वाले आम आदमी पार्टी के सुप्रीमों अरविंद केजरीवाल को भी इस बात की भनक नहीं लग पाई की उनके सात सांसद झाडू फेंक कर कमल थामने जा रहे हैं। निश्चित रूप से पंजाब विधानसभा चुनाव के छह माह पहले आम आदमी पार्टी में हुई यह बगावत पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। इसका असर निश्चित रूप से पंजाब विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा। गौरतलब है कि जिन 7 सांसदों ने भाजपा का दामन थामा है। उनमें से छह सांसद राघव चढ्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, राजेन्द्र गुप्ता, विक्रम साहनी और हरभजन सिंह पंजाब से ही राज्यसभा के लिए चुने गये थे। सिर्फ स्वाति मालीवाल भी दिल्ली से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुई थी।

हालांकि इन सातों सांसदों में से अधिकांश की कोई जमीनी पकड़ नहीं है लेकिन राघव चढ्ढा और संदीप पाठक का पार्टी छोडऩा आम आदमी पार्टी के लिए घातक सिद्ध होगा। ये दोनों ही नेता नई दिल्ली और पंजाब में पार्टी संगठन को खड़ा करने में और विधानसभा चुनाव जिताने में अग्रणि भूमिका निभा चुके हैं। यही नहीं बल्कि संदीप पाठक तो एक तरह से पूरी पार्टी ही चलाते रहे हैं। वहीं राघव चढ्ढा कभी अरविंद केजरीवाल के दाहिंने हाथ भी रह चुके हैं। ये दोनों ऐसे नेता जिनकी कभी आम आदमी पार्टी में तूती बोला करती थी। पार्टी संगठन के बारे में ये दोनों अरविंद केजरीवाल से भी ज्यादा जानकारी रखते थे। इसलिए इनका पार्टी छोडऩा ऊपर से भाजपा में शामिल होना आम आदमी पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

ये घर के भेदी लंका ढा सकते हैं। अब वे ऐसा करेंगे या नहीं करेंगे इस बारे में फिल्हाल कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन यदि आम आदमी पार्टी के संजय सिंह जैसे नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान तथा मनीष सिसोदिया इन बाकी सांसदों को गद्दार बताते रहेंगे तो कोई बड़ी बात नहीं की ये भी गुस्से में आकर आम आदमी पार्टी के खिलाफ मुहिम छेड़ दें तो कोई ताज्जुब नहीं होगा। खासतौर पर संदीप पाठक जो आम आदमी पार्टी के प्रमुख चुनावी रणनीतिकार रहे हैं वे आम आदमी पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। यही वजह है कि इनकी बगावत से बौखला कर आम आदी पार्टी के नेता इनके खिलाफ जमकर भड़ास निकाल रहे हैं और इसके लिए भाजपा को भी निशाने पर ले रहे हैं।

खासतौर पर पंजाब में तो भगवंत सिंह मान को तो भारी झटका लगा है क्योंकि वहां आम आदमी पार्टी के कई विधायकों के भी पाला बदलने की संभावना बलवित हो गई है। यही वजह है कि भगवंत सिंह मान ने इन सांसदों की बगावत को पंजाब का अपमान बताया है और कहा है कि पंजाब के लोग इन गद्दारों को कभी नहीं भुलेंगे। उन्होंने तो भाजपा को यह भी चैलेंज दिया है कि अगर उसमें दम है तो वह उनके खिलाफ ईडी या सीबीआई की कार्यवाही करके बताये और उन्हें खरीद कर दिखाये दुनिया में ऐसी कोई करेंसी नहीं बनी है जो उन्हें खरीद सके।

समझ में नहीं आता कि भगवंत सिंह मान भाजपा को चैलेंज दे रहे हैं या ऑफर दे रहे हैं। जहां तक इन सांसदों की बगावत से भाजपा को पंजाब विधानसभा चुनाव में फायदा मिलने की बात है तो इसकी दूर दूर तक कोई संभावना नहीं है क्योंकि पंजाब में भाजपा का जनाधार बहुत कमजोर है और इन सांसदों में भले ही छह सांसद पंजाब से चुने गये हों लेकिन इनमें से अधिकांश की पंजाब में कोई खास पकड़ नहीं है। अलबत्ता इससे कांग्रेस को फायदा मिल सकता है। इस बार भी पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच ही सीधा मुकाबला होना है। ऐसे में यह कांग्रेस पर निर्भर है कि वह इस स्थिति का कितना लाभ उठा सकती है। रही बात भाजपा की ते उसे गुजरात के नगरीय निकाय चुनाव में इस बदले हुए घटनाक्रम का फायदा मिल सकता है। बहरहाल देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी में हुई बगावत की आंधी और कितना फैलती है।

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