Muslim Inheritance Law India : वसीयत की भी है कानूनी सीमा, हाई कोर्ट ने साफ कहा: बिना सहमति एक तिहाई से ज्यादा संपत्ति नहीं दी जा सकती

सीजी भास्कर, 09 फरवरी। बिलासपुर स्थित Chhattisgarh High Court ने मुस्लिम उत्तराधिकार कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय (Muslim Inheritance Law India) सुनाया है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुसलमान अपने कानूनी उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना वसीयत के जरिए अपनी संपत्ति के एक तिहाई से अधिक हिस्से का निपटान नहीं कर सकते। अदालत ने इसे मुस्लिम कानून का मूलभूत सिद्धांत बताते हुए दो निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया।
यह फैसला Justice B. D. Guru की एकल पीठ द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतें एक विधवा के वैध कानूनी अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहीं और वसीयत को चुनौती देने का गलत बोझ महिला पर डाल दिया गया।
मामला कोरबा जिले की एक संपत्ति से जुड़ा है, जहां 64 वर्षीय जैबुन निशा ने अपने दिवंगत पति अब्दुल सत्तार लोधिया की संपत्ति पर अधिकार को लेकर याचिका (Muslim Inheritance Law India) दायर की थी। पति की मृत्यु के बाद राजस्व रिकॉर्ड में जैबुन निशा के साथ उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर का नाम दर्ज कर दिया गया था। सिकंदर ने खुद को दत्तक पुत्र बताते हुए अप्रैल 2004 की एक वसीयत के आधार पर पूरी संपत्ति पर दावा किया।
जैबुन निशा ने अदालत में तर्क दिया कि प्रस्तुत वसीयत संदिग्ध है और उस पर हस्ताक्षर बाद में कराए गए। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “केवल चुप्पी या कानूनी कार्रवाई में देरी को सहमति नहीं माना जा सकता।” अदालत ने पाया कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि विधवा ने अपने अधिकार छोड़ने की स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति दी थी।
हाई कोर्ट ने मुस्लिम कानून के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी मुसलमान अपनी संपत्ति का केवल एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत के माध्यम (Muslim Inheritance Law India) से दे सकता है। इससे अधिक हिस्से की वसीयत तभी मान्य होगी, जब वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद सभी कानूनी उत्तराधिकारी स्पष्ट रूप से सहमति दें।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि भले ही प्रस्तुत वसीयत वास्तविक मानी जाए, फिर भी उसके आधार पर एक तिहाई से अधिक संपत्ति का दावा नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले रद्द करते हुए कहा कि उत्तराधिकारियों के अधिकारों की रक्षा मुस्लिम कानून की आत्मा है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।



