छत्तीसगढ़

मूक-बधिर व दृष्टिबाधित बच्चों तक पहुंची दाई-दीदी एमएमयू

विशेष स्वास्थ्य शिविर में 90 बच्चों की जांच, टायफायड-मलेरिया के लक्षण वाले बच्चे को किया रेफर

नवभारत प्रतिनिधि। रायपुर। अस्पताल तक पहुंचना जिन बच्चों के लिए आसान नहीं, उनके बीच स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की पहल के तहत मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना की दाई-दीदी मोबाइल मेडिकल यूनिट ने मठपुरैना स्थित शासकीय मूक-बधिर एवं दृष्टिबाधितार्थ विद्यालय में विशेष स्वास्थ्य शिविर लगाया। शिविर में कुल 90 बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। इस दौरान एक बच्चे में टायफायड एवं मलेरिया जैसे लक्षण पाए जाने पर उसे आवश्यक जांच और उपचार के लिए रेफर किया गया।

शिविर में चिकित्सकीय टीम ने बच्चों की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए संवेदनशीलता के साथ स्वास्थ्य जांच की। बच्चों को आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श और उपचार भी उपलब्ध कराया गया। स्वास्थ्य समस्या को सामान्य तरीके से बताना जिन बच्चों के लिए चुनौतीपूर्ण है, उनके बीच पहुंचकर जांच करने की यह पहल स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व और उप मुख्यमंत्री नगरीय प्रशासन एवं विकास अरुण साव के मार्गदर्शन में आयोजित शिविर महापौर मीनल चौबे, स्वास्थ्य विभाग अध्यक्ष गायत्री चंद्राकर और नगर निगम आयुक्त संबित मिश्रा के निर्देशानुसार लगाया गया। अपर आयुक्त स्वास्थ्य विनोद पांडे और उपायुक्त स्वास्थ्य जसदेव सिंह बाबरा के मार्गदर्शन में एरिया प्रोजेक्ट मैनेजर काजल शर्मा की उपस्थिति में शिविर संपन्न हुआ।

समय पर हुई स्वास्थ्य समस्या की पहचान

शिविर में डॉ. निवेदिता चन्द्रा ने बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। फार्मासिस्ट नंदिनी साहू, लैब टेक्नीशियन अंजू साहू और नर्स नेहा निर्मलकर ने सहयोग किया। जांच के दौरान एक बच्चे में टायफायड और मलेरिया जैसे लक्षण सामने आए। चिकित्सकीय टीम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए बच्चे को आगे की जांच और उपचार के लिए रेफर किया।

अस्पताल नहीं, मरीज तक पहुंचेगी स्वास्थ्य सेवा

दाई-दीदी एमएमयू का उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को अस्पताल तक सीमित रखने के बजाय जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना है। मठपुरैना के विशेष विद्यालय में आयोजित शिविर इसी सोच का उदाहरण रहा। विशेष बच्चों के बीच पहुंचकर उनकी स्वास्थ्य जांच और उपचार की सुविधा उपलब्ध कराने से योजना की मूल भावना ‘अस्पताल तक मरीज नहीं, मरीज तक स्वास्थ्य सेवा’ को मजबूती मिली है।

यह पहल विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के साथ समय पर बीमारी की पहचान और उपचार सुनिश्चित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हुई।

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