Editorial: आम आदमी पार्टी के सात बागी सांसदों ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी और फिर उन्होंने इस बाबत् राज्यसभा के सभापति को पत्र सौंप दिया था। जिसपर विचार करने के बाद राज्यसभा के सभापति ने आम आदमी पार्टी के इन सातों सांसदों के भाजपा में विलय को मंजूरी दे दी है। इन बागी सांसदों की राज्यसभा सदस्यता खत्म कराने के लिए आम आदमी पार्टी के नेता अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं उनका कहना है कि इन सात बागी सांसदों का भाजपा में जाना दलबदल कानून के तहत आता है इसलिए इन्हें आयोग्य करार देना चाहिए। किन्तु उनका यह तर्क शायद ही सुप्रीम कोर्ट में चल पाये क्योंकि आम आदमी पार्टी के दस राज्यसभा सदस्यों में से 7 ने पार्टी छोडी है और भाजपा का दामन थामा है।
दलबदल कानून के तहतह यह मामला आता ही नहीं है क्योंकि तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई की सरकार के दौरान संविधान में संसोधन करके यह प्रावधान किया गया था कि यदि किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य दलबदल करते हैं तो उनकी सदस्यता बरकरर रहेगी। इसके पूर्व तो एक तिहाई सदस्यों ेके पाला बदलने पर भी दलबदल कानून लागू नहीं होता था। इसलिए इन बागी सांसदों के खिलाफ कार्यवाही होना नामुमकीन की हद तक कठिन है। वैसे भी दलबदल करने वाले विधायकों और सांसदों को अयोग्य करा देने या न देने का अधिकार उस सदन के सभापति के हाथों सुरक्षित रहता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करता जब तक की मामला बहुत ही जटिल न हो।
यहां सात सांसदों का दल बदलना विधि सम्मत है ऐसे में भले ही आम आदमी पार्टी राज्यसभा के सभापति के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दें लेकिन वहां से भी उसके मनमाफिक फैसले की उम्मीद कम ही है। बहरहाल इन सात सांसदों के भाजपा में आ जाने से अब राज्यसभा में भाजपा की ताकत और बढ़ गई है जहां अब एनएडीए बहुमत के और करीब पहुंच गई है अब भाजपा को राज्यसभा में अपने महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में और आसानी होगी। वैसे आम आदमी पार्टी के नेता इन बागी सांसदों के खिलाफ कार्यवाही का जो मन बना रहे हैं और इसे लेकर सरकार पर आरोप लगा रहे हैं।
उसे देखते हुए अब समय आ गया है कि दल बदल कानून में एक बार फिर संसोधन करने पर विचार किया जाये। जिस राघव चढ्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों ने बगावत करके भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया उसी राघव चढ्ढा ने संसद के पिछले सत्र में ही यह मांग उठाई थी कि दलबदल करने वाले नेताओं पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में संसोधन किया जाये और दो तिहाई जनप्रतिनिधियों की जगह तीन चौथाई जनप्रतिनिधियों के दल बदलने को दलबदल कानून से पृथक रखा जाये।
उनकी यह मांग नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई थी और अब उसी राघव चढ्ढा की अगुवाई में आम आदमी पार्टी के दो तिहाई सांसदों ने दल बदल कर दिया। दरअसल दल बदल कानून की समीक्षा करने तथा इसे और कड़ा बनाने में किसी भी राजनीतिक पार्टी की मंशा ही नहीं है। यही वजह है कि आया राम गया राम की परी पार्टी बदस्तुर चल रही है।
