Mamata Banerjee Controversy : सुप्रीम कोर्ट में IPAC मामले की गूंज, ED–बंगाल सरकार आमने-सामने, जांच में दखल पर तीखा टकराव
Mamata Banerjee Controversy
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रणनीतिकारों से जुड़ी IPAC रेड का मामला गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचते ही कानूनी बहस से ज्यादा संवैधानिक टकराव का रूप लेता दिखा। प्रवर्तन निदेशालय और राज्य सरकार (Mamata Banerjee Controversy) के बीच हुई सुनवाई में आरोप-प्रत्यारोप इतने तीखे रहे कि अदालत को खुद टिप्पणी करनी पड़ी कि मामला “बेहद गंभीर” है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
केंद्र की ओर से पेश पक्ष ने दावा किया कि रेड के दौरान जांच एजेंसी के काम में सीधा हस्तक्षेप हुआ, जबकि बंगाल सरकार ने इन आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के तर्कों से यह साफ हुआ कि विवाद सिर्फ एक छापेमारी तक सीमित नहीं, बल्कि केंद्रीय एजेंसियों और राज्यों के अधिकारों की सीमा तक जा पहुंचा है।
ED के आरोप: जांच को किया गया बाधित
ED की ओर से अदालत को बताया गया कि धनशोधन से जुड़े एक मामले में IPAC से संबंधित परिसरों पर कार्रवाई की जा रही थी, तभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी से हालात (Mamata Banerjee Controversy) बदल गए। एजेंसी का कहना है कि पीएमएलए के तहत चल रही कार्रवाई को राजनीतिक रंग दिया गया और मौके पर मौजूद अधिकारियों को दबाव का सामना करना पड़ा।
ED ने यह भी कहा कि अगर ऐसी घटनाओं को अनदेखा किया गया, तो भविष्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों के लिए स्वतंत्र रूप से काम करना मुश्किल हो जाएगा। इसी आधार पर अदालत से राज्य अधिकारियों के खिलाफ सख्त निर्देश देने की मांग रखी गई।
कोर्ट में उठे प्रमुख सवाल
क्या रेड के दौरान संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन हुआ?
क्या जांच एजेंसी के काम में जानबूझकर दखल दिया गया?
राज्य पुलिस की भूमिका कितनी निष्पक्ष रही?
बंगाल सरकार की सफाई
राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने ED के दावों को “एकतरफा” बताया। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी को गलत तरीके से पेश किया गया है और किसी भी तरह की जब्ती या बाधा का आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। सरकार का पक्ष था कि जो भी कदम उठाए गए, वे कानून के दायरे में और परिस्थितियों के अनुसार थे।
राज्य पक्ष ने यह भी कहा कि अदालत के समक्ष रखी गई कुछ बातें दस्तावेजी रिकॉर्ड से मेल नहीं खातीं और इससे मामले को अनावश्यक रूप से तूल दिया जा रहा है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि इस प्रकरण में कई ऐसे पहलू हैं, जो न्यायिक जांच (Mamata Banerjee Controversy) की मांग करते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी—दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इसी के साथ अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है।
क्यों अहम है यह मामला
केंद्रीय एजेंसियों की कार्यशैली पर असर
राज्य बनाम केंद्र अधिकारों की बहस
राजनीतिक रणनीति कंपनियों की भूमिका पर सवाल
कुल मिलाकर, IPAC रेड से शुरू हुआ यह मामला अब सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक और संवैधानिक विमर्श का केंद्र बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई से यह तय होगा कि जांच एजेंसियों की सीमाएं कहां तक हैं और राज्य सरकारें उनमें किस हद तक दखल दे सकती हैं।
