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Luxury Car Import Duty Cut : एक समझौता, एक फैसला और बदल जाएगी लग्जरी कारों की किस्मत, कीमतों पर बड़ा असर तय

भारत और यूरोपीय संघ के बीच घोषित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के बाद यूरोप से आयात होने वाली लग्जरी कारों पर लगने वाले भारी सीमा शुल्क में बड़ी कटौती तय मानी जा रही है। समझौते के लागू होते ही मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, रेंज रोवर, रोल्स रॉयस और अन्य यूरोपीय ब्रांड्स की कारें भारतीय बाजार में पहले के मुकाबले कहीं सस्ती हो सकती हैं।

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वर्तमान व्यवस्था के तहत भारत यूरोप से आयात की जाने वाली 40,000 डॉलर से कम कीमत वाली यात्री कारों पर करीब 70 प्रतिशत और इससे अधिक कीमत वाली कारों पर लगभग 110 प्रतिशत तक सीमा शुल्क (Luxury Car Import Duty Cut) वसूलता है। नए एफटीए के प्रावधानों के अनुसार यह शुल्क चरणबद्ध तरीके से घटकर लगभग 10 प्रतिशत तक लाया जा सकता है, जिससे आयातित गाड़ियों की लागत में भारी कमी आएगी।

ऑटो सेक्टर के जानकारों का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर एक्स-शोरूम कीमतों पर दिखाई देगा। उदाहरण के तौर पर, करीब एक करोड़ रुपये की CIF वैल्यू वाली यूरोपीय लग्जरी कार, जो अभी टैक्स और ड्यूटी के बाद लगभग तीन करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है, उसकी कीमत नए ढांचे में काफी नीचे आ सकती है।

संभावित कीमतों की बात करें तो कई प्रीमियम मॉडल्स में उल्लेखनीय गिरावट देखी (Luxury Car Import Duty Cut) जा सकती है। मर्सिडीज-बेंज जी-क्लास, लैंड रोवर डिफेंडर, रेंज रोवर और रोल्स-रॉयस घोस्ट जैसी कारें आने वाले समय में मौजूदा दामों से करोड़ों रुपये तक सस्ती हो सकती हैं। इससे न केवल लग्जरी सेगमेंट में मांग बढ़ेगी, बल्कि यूरोपीय ब्रांड्स की बाजार हिस्सेदारी भी मजबूत होगी।

हालांकि, इस समझौते के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों को शुरुआती पांच वर्षों के लिए अलग रखा गया है। इसका उद्देश्य घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियों को प्रतिस्पर्धा के लिए समय देना बताया जा रहा है, ताकि स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग को नुकसान न पहुंचे।

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यूरोप से भारत में आयात होने वाली कारों की सूची में मर्सिडीज, ऑडी, बीएमडब्ल्यू, वोल्वो, पोर्शे, फरारी, लैंबॉर्गिनी, बेंटले, जगुआर, लैंड रोवर और रोल्स-रॉयस जैसे बड़े नाम शामिल (Luxury Car Import Duty Cut) हैं। उद्योग जगत का मानना है कि एफटीए लागू होने के बाद भारत का लग्जरी कार बाजार नई रफ्तार पकड़ेगा और प्रीमियम सेगमेंट में बिक्री के आंकड़े तेजी से ऊपर जा सकते हैं।

यह समझौता सिर्फ कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि आने वाले वर्षों में भारतीय ऑटो बाजार वैश्विक स्तर पर कहीं ज्यादा प्रतिस्पर्धी और विविध हो सकता है।

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