असम के पावन नीलाचल पर्वत पर स्थित विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर के कपाट शुक्रवार सुबह तड़के एक बार फिर आम श्रद्धालुओं और भक्तों के लिए खोल दिए गए हैं। कपाट खुलते ही अलसुबह से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु देवी कामाख्या के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए लंबी-लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते नजर आए। कपाट खुलने के साथ ही मंदिर परिसर में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक और चार दिवसीय ‘अंबुबाची मेला’ भी विधि-विधान के साथ संपन्न हो गया है। सनातन परंपरा और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस विशिष्ट उत्सव के दौरान मंदिर के कपाट तीन दिनों तक पूरी तरह बंद रहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इन दिनों में देवी कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं।
सीएम ने दी बधाई, बोले- ‘यह नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक’
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बताया कि इस वर्ष अंबुबाची मेले में देश और दुनिया भर से आए 8 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए इस भव्य आयोजन को एक अद्वितीय आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उत्सव करार दिया। उन्होंने कहा कि अंबुबाची मेला न केवल असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है, बल्कि यह सनातन संस्कृति में नारी शक्ति और उनके सर्वोच्च सम्मान का सबसे बड़ा प्रतीक भी है।
विशेष महास्नान के बाद खुले कपाट, सुरक्षा के कड़े इंतजाम
कामाख्या मंदिर प्रशासन और मुख्य पुजारियों के अनुसार, तीन दिनों की गोपन अवधि समाप्त होने के बाद शुक्रवार सुबह सबसे पहले गर्भगृह की शुद्धि की गई। इसके बाद देवी कामाख्या का विशेष महास्नान कराया गया और फिर महाआरती व विशेष पूजा-अर्चना के बाद सुबह के शुभ मुहूर्त में कपाट खोले गए।
कपाट खुलते ही पूरा नीलाचल पर्वत ‘जय मां कामाख्या’ के जयकारों से गूंज उठा। मंदिर ट्रस्ट और स्थानीय जिला प्रशासन के अधिकारियों ने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा और सुगम दर्शन के कड़े इंतजाम किए हैं। अधिकारियों ने सभी भक्तों से कतारबद्ध होकर शांतिपूर्वक और अनुशासित तरीके से दर्शन करने की विशेष अपील की है।
धार्मिक पर्यटन का बना सबसे बड़ा केंद्र
हर साल की तरह इस वर्ष भी अंबुबाची मेले में भारत के कोने-कोने से आए नागा साधुओं, अघोरियों, तांत्रिकों के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और शोधकर्ता भी गुवाहाटी पहुंचे। पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए इस बार के आयोजन ने पूर्वोत्तर भारत के धार्मिक पर्यटन (रिलिजियस टूरिज्म) को एक नई और मजबूत दिशा दी है। इस मेले ने न केवल असम की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की है, बल्कि वैश्विक पटल पर असम की अद्वितीय सांस्कृतिक पहचान और लोक परंपरा को और ज्यादा सुदृढ़ किया है।
