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Jallianwala Bagh History : स्वर्ण मंदिर की ‘अरदास’ से जलियांवाला बाग की ‘चीख’ तक: अमृतसर की गलियों में खोया एक पत्रकार का हृदय

अमृतसर केवल एक शहर नहीं है; यह एक अहसास है जो आपको एक ही दिन में मोक्ष और मृत्यु, शांति और संघर्ष, तथा प्रार्थना और प्रलाप के बीच खड़ा (Jallianwala Bagh History) कर देता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय रायपुर द्वारा आयोजित इस प्रेस टूर के माध्यम से जब हम 14 पत्रकार छत्तीसगढ़ की शांत वादियों से निकलकर पंजाब की इस तप्त और पवित्र मिट्टी पर पहुँचे, तो हमें अंदाज़ा नहीं था कि यह यात्रा हमारी पेशेवर डायरी का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी आत्मा का एक स्थायी अध्याय बन जाएगी।

एक पत्रकार के नाते, मेरी कलम ने हजारों खबरें लिखी हैं, सैकड़ों त्रासदियों को शब्दों में पिरोया है, लेकिन अमृतसर ने मेरी स्याही को आज एक अलग ही नमी दे दी है।

स्वर्ण मंदिर: जहाँ घमंड की दीवारें गिर जाती हैं (Jallianwala Bagh History)

सुबह की पहली किरण जब श्री हरमंदिर साहिब स्वर्ण मंदिर के स्वर्णमंडित गुंबदों पर पड़ती है, तो ऐसा लगता है मानो ईश्वर ने स्वयं धरती पर अपना प्रतिबिंब उतार दिया हो। इस मंदिर की वास्तुकला की सबसे बड़ी विशेषता इसका नीचा होना है-आपको अंदर जाने के लिए सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। यह प्रतीकात्मक है कि यदि आप उस परम सत्ता से मिलना चाहते हैं, तो आपको अपने ‘अहंकार’ को त्यागकर झुकना ही होगा।

16वीं शताब्दी में गुरु रामदास जी ने जब इस सरोवर की खुदाई शुरू की थी, तो उन्होंने शायद इसी ‘अमृत’ (अमरत्व) की कल्पना की थी। एक पत्रकार के रूप में, मैंने यहाँ की व्यवस्था को नहीं, बल्कि यहाँ की ‘संवेदनशीलता’ को महसूस किया। साईं मियां मीर, जो एक मुस्लिम सूफी संत थे, उनके द्वारा रखी गई इसकी नींव आज के खंडित समाज को एक मूक संदेश देती है कि प्रेम का कोई धर्म नहीं होता।

जब मैं उस ‘अमृत सरोवर’ के किनारे बैठा, तो अमृतसर की ठंडी हवा और गूँजती हुई ‘गुरबानी’ ने मेरे भीतर के शोर को शांत कर दिया। यहाँ का ‘लंगर’ दुनिया का सबसे बड़ा पाठशाला (Jallianwala Bagh History) है, जहाँ कोई संपादक नहीं, कोई मजदूर नहीं, कोई वीआईपी नहीं – सब एक ही कतार में बैठकर मानवता का स्वाद चखते हैं। यहाँ की शांति आपको भीतर से इतना खाली कर देती है कि आप खुद को ईश्वर के करीब पाते हैं।

जलियांवाला बाग: जहाँ दीवारें आज भी रोती हैं

स्वर्ण मंदिर की उस रूहानी शांति से निकलकर जब हम महज कुछ कदमों की दूरी पर स्थित जलियांवाला बाग पहुँचे, तो हृदय का तापमान अचानक बदल गया। वह संकरी गली, जिससे हम अंदर दाखिल हुए, इतिहास की उस क्रूरता का साक्षात गवाह है जिसे ब्रिटिश साम्राज्य कभी धो नहीं पाएगा।

13 अप्रैल, 1919 का वह दिन, बैसाखी का उल्लास और फिर जनरल डायर की उन बंदूकों की गड़गड़ाहट…। उस संकरे मार्ग पर खड़े होकर मैंने महसूस किया कि कैसे उन निहत्थे लोगों के पास भागने का कोई रास्ता नहीं था। एक पत्रकार के रूप में, मैं उन दीवारों पर खुदे गोलियों के निशानों को देख रहा था, लेकिन एक इंसान के रूप में, मैं उन मासूमों की चीखें सुन रहा था जो अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे होंगे।

वह ‘शहीदी कुआं’… जहाँ जाने के बाद शब्द मर जाते हैं। उस कुएं की मुंडेर पर हाथ रखते ही एक कंपकंपी सी महसूस हुई। अपनी जान बचाने के लिए सैकड़ों लोगों ने उस अंधेरी गहराई को चुना, यह सोचकर कि शायद मौत उन्हें वहां नहीं ढूँढ पाएगी। लेकिन वह कुआं आज भी एक सामूहिक कब्र की तरह हमें हमारे पूर्वजों के बलिदान की याद दिलाता है।

इतिहास कहता है कि यहाँ की मिट्टी लाल हो गई थी। आज वहां घास है, फूल हैं, और एक सुंदर स्मारक है, लेकिन एक संवेदनशील हृदय के लिए वहां आज भी बलिदान की महक है। यह वह स्थान है जहाँ सरदार उधम सिंह ने शपथ ली थी, और यह वह स्थान है जहाँ भारत की आजादी की सबसे बड़ी कीमत चुकाई गई थी।

रायपुर से अमृतसर तक का सफर

रायपुर से अमृतसर तक का यह सफर, जिसे केंद्र सरकार ने मुमकिन (Jallianwala Bagh History) बनाया, मेरे लिए एक आईना साबित हुआ। छत्तीसगढ़ की महानदी का धैर्य और पंजाब की झेलम-चनाब का वेग आज मेरे भीतर मिल गए हैं। हमने देखा कि कैसे भारत अपनी विविधता में एकता पिरोए हुए है।

स्वर्ण मंदिर ने हमें ‘क्षमा’ और ‘सेवा’ सिखाई, तो जलियांवाला बाग ने हमें ‘स्वाभिमान’ और ‘बलिदान’ का पाठ पढ़ाया। एक पत्रकार होने के नाते हम अक्सर तथ्यों के पीछे भागते हैं, लेकिन आज हमने ‘तथ्यों’ के पीछे छिपी उस ‘पीड़ा’ को महसूस किया जिसने इस देश को गढ़ा है।

आज जब मैं इस आलेख को विराम दे रहा हूँ, मेरी आँखों के सामने अभी भी वह सरोवर की चमक और उन दीवारों के घाव तैर रहे हैं। अमृतसर ने मुझे सिखाया है कि हमारी कलम को केवल स्याही की नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की भी जरूरत है।

छत्तीसगढ़ के 14 पत्रकारों का यह दल जब वापस रायपुर लौटेगा, तो उनके बैग में केवल स्मृति चिन्ह नहीं होंगे, बल्कि उनके दिलों में उस शहादत का सम्मान और उस आध्यात्मिक शांति का अंश होगा, जो आने वाले समय में उनकी पत्रकारिता को एक नई दिशा देगा। यह केवल भौगोलिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह ‘स्व’ से ‘सर्वस्व’ तक की यात्रा थी।

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