Insurance Companies Claim Rejected : सड़क हादसों के पीड़ितों को हाई कोर्ट से बड़ी राहत, अब ‘तारीख’ का बहाना बनाकर क्लेम नहीं रोक सकेंगी बीमा कंपनियां

सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए न्याय की राह अब थोड़ी आसान (Insurance Companies Claim Rejected) हो गई है। हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि क्षतिपूर्ति के दावों को महज ‘देरी’ या ‘समय सीमा’ (डेडलाइन) के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
अक्सर देखा जाता है कि हादसे के सदमे या अन्य कारणों से क्लेम करने में हुई देरी का फायदा उठाकर बीमा कंपनियां भुगतान करने से साफ इनकार कर देती हैं। कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि तकनीकी पेच फंसाकर किसी पीड़ित को उसके हक से वंचित रखना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत का यह रुख उन हजारों परिवारों के लिए संजीवनी बनकर आया है, जो अपनों को खोने के बाद कानूनी बारीकियों में उलझकर रह गए थे।
बीमा कंपनियों की दलीलों को कोर्ट ने किया दरकिनार, 40 से ज्यादा याचिकाएं खारिज (Insurance Companies Claim Rejected)
दरअसल, श्रीराम जनरल इंश्योरेंस, चोलामंडलम, आईसीआईसीआई लोम्बार्ड और टाटा एआईजी समेत कई बड़ी कंपनियों ने हाई कोर्ट में 40 से अधिक सिविल रिवीजन याचिकाएं दायर की थीं। इन कंपनियों का तर्क था कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166 (3) के तहत एक निश्चित समय सीमा बीत जाने के बाद क्लेम ट्रिब्यूनल को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है।
कंपनियों की कोशिश थी कि समय सीमा के तकनीकी नियम का हवाला देकर वे अपनी आर्थिक जवाबदेही से बच सकें। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन सभी तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मानवीय संवेदनाएं और न्याय की प्राथमिकता कानूनी बारीकियों से ऊपर है।
ट्रिब्यूनल में जारी रहेगी सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी निगाहें
हाई कोर्ट ने सभी मोटर दुर्घटना क्लेम ट्रिब्यूनल्स को निर्देश दिया है कि वे इन मामलों पर कानून के अनुसार अपनी सुनवाई जारी रखें और पीड़ितों के आवेदनों को बंद (Insurance Companies Claim Rejected) न करें। हालांकि, यह कानूनी मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है, इसलिए हाई कोर्ट ने एक बीच का रास्ता निकालते हुए कहा है कि जब तक शीर्ष अदालत का अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक ट्रिब्यूनल कोई अंतिम आदेश पारित नहीं करेंगे।
इस फैसले ने बीमा कंपनियों के उस अडिग रवैये को झटका दिया है, जहाँ वे केवल कागजी देरी को आधार बनाकर पीड़ितों की मदद करने से पीछे हट जाती थीं। अब पीड़ितों को यह छूट रहेगी कि वे सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले के आधार पर अपनी बात ट्रिब्यूनल के सामने रख सकेंगे।



