Illegal Arrest Case : गैरकानूनी गिरफ्तारी मामला, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इन्कार

Illegal Arrest Case

Illegal Arrest Case

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कथित रूप से की गई गैरकानूनी गिरफ्तारी (Illegal Arrest Case) के खिलाफ दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इन्कार कर दिया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दे दी है।

उत्तराखंड के हल्द्वानी निवासी कारोबारी उमंग रस्तोगी द्वारा दाखिल याचिका पर न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की अवकाशकालीन पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने उमंग रस्तोगी की ओर से पेश अधिवक्ताओं आनंद कुमार और आदित्य गिरि से कहा कि वे इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट से राहत की मांग करें। अदालत ने यह भी नोट किया कि इसी प्रकरण से जुड़ी एक याचिका याचिकाकर्ता के पिता की गिरफ्तारी को लेकर पहले से दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब एक समान मामला पहले ही हाई कोर्ट में विचाराधीन है, तो आदर्श स्थिति यही होगी कि हाई कोर्ट ही इस मामले पर भी विचार करे। पीठ ने कहा कि यह याचिकाकर्ता के लिए अधिक उपयुक्त मंच होगा।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश पुलिस के बिसरख थाने द्वारा उमंग रस्तोगी को हल्द्वानी से प्रतिशोध की भावना के तहत गिरफ्तार किया गया। अधिवक्ताओं ने कहा कि गिरफ्तारी के समय न तो कोई लिखित कारण बताया गया और न ही विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किया गया, जो कि गैरकानूनी गिरफ्तारी (Illegal Arrest Case) की श्रेणी में आता है।

अधिवक्ता आदित्य गिरि ने अदालत को बताया कि उमंग रस्तोगी और उनका परिवार उत्तराखंड और दिल्ली में निवास करता है, इसके बावजूद उत्तर प्रदेश पुलिस उन्हें लगातार निशाना बना रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता के पिता को 28 नवंबर को दिल्ली से अवैध रूप से गिरफ्तार किया गया था और उन्हें किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए बिना करीब पांच दिनों तक ग्रेटर नोएडा के बिसरख पुलिस थाने में हिरासत में रखा गया।

पीठ को यह भी अवगत कराया गया कि याचिकाकर्ता के पिता की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित है, जिस पर 8 जनवरी को सुनवाई प्रस्तावित है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को उचित अदालत से राहत लेने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।

You may have missed